गाजियाबाद/मेरठ (उप्र), एक अप्रैल (भाषा) युद्धग्रस्त ईरान से लौटे भारतीय नाविकों के लिये पिछले 50 दिन किसी बुरे ख्वाब की तरह थे। अपने वतन लौटते वक्त हमले की जद में आने का डर हर वक्त उनके दिल में था, लेकिन उन्हें यह जोखिम उठाना ही था।
गाजियाबाद के रहने वाले केतन मेहता (27) उस पल को याद करके आज भी सिहर जाते हैं जब एक सामान्य समुद्री यात्रा के तौर पर शुरु हुआ सफर महीनों तक चलने वाले सख्त इम्तेहान में बदल गया। इस दौरान उन्हें और उनके साथी नाविकों को पहले तो तस्करी के शक के आधार पर हिरासत में लिया गया और बाद में वह पश्चिम एशिया में जारी युद्ध में फंस गए।
घटनाओं का यह सिलसिला पिछले साल आठ दिसंबर को शुरू हुआ था जब तेल टैंकर एमटी वेलिएंट रोर को संयुक्त अरब अमीरात के खोर फक्कन जाते वक्त अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में रोक लिया गया था। जहाज पर चालक दल के 18 सदस्य सवार थे जिनमें से 16 भारतीय थे।
जहाज पर सवार लोगों में मेरठ के कैप्टन विजय कुमार (45) और गाजियाबाद के थर्ड इंजीनियर केतन मेहता भी थे।
मेहता के अनुसार ईरानी अधिकारियों ने शुरू में चालक दल के सदस्यों पर डीजल की तस्करी और बाद में अवैध रूप से तेल ले जाने का आरोप लगाया, लेकिन अदालत में दोनों में से कोई भी आरोप साबित नहीं हो सका।
मेहता ने बुधवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”इस दौरान, हमें लगभग 50 दिन तक जेल में रखा गया। मुश्किल यह थी कि हम उनकी भाषा नहीं समझ पाते थे और न ही वे हमारी।”
उन्होंने बताया कि आरोपों से बरी होने के बाद उन्हें 26 फरवरी को रिहाई के कागजात हासिल होने से उन्हें बड़ी राहत मिली थी लेकिन वह ज्यादा वक्त तक नहीं टिक सकी, क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया जिससे वे युद्ध क्षेत्र में फंस गये।
मेहता ने बताया कि इस मामले में भारतीय दूतावास ने हस्तक्षेप किया और उन्हें सलाह दी कि बंदर अब्बास में रहना सुरक्षित नहीं है। उन्होंने बताया कि दूतावास ने उन्हें आर्मेनिया या आजरबैजान के रास्ते वहां से निकलने का सुझाव दिया।
मेहता के पिता मुकेश मेहता ने कहा कि इस घटनाक्रम से उनके परिवार के लोग बेहद फिक्रमंद हो गये।
मेहता के पिता मुकेश ने गाजियाबाद में ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”जब युद्ध शुरू हुआ तो हम बहुत तनाव में थे। हमारे बच्चे खतरे में थे।”
उन्होंने कहा कि रिहाई के बाद भी नाविकों को शुरू में बंदर अब्बास बंदरगाह पर ही रोककर रखा गया था लेकिन बाद में भारतीय वाणिज्य दूतावास के अधिकारियों ने उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद की और उनके रहने, खाने-पीने तथा अन्य जरूरी चीजों का प्रबंध किया।
मुकेश ने बताया कि हालात बिगड़ने और तुरंत वहां से निकलने का कोई रास्ता न होने पर नाविकों ने सड़क के रास्ते ईरान छोड़ने का फैसला किया लेकिन लगभग दो हजार किलोमीटर की यह यात्रा बेहद खतरनाक थी क्योंकि युद्धग्रस्त इलाके में कब कहां बम या मिसाइल से हमला हो जाए, कहा नहीं जा सकता।
उन्होंने बताया, ”केतन और उसके साथियों ने सड़क के रास्ते आर्मेनिया तक का पूरा सफर तय किया और उसके बाद फिर दुबई के लिए उड़ान में सवार हुए और आखिरकार मुंबई पहुंचे।”
मुकेश ने कहा कि भारत में नाविकों के परिजन ने इस यात्रा के लिए धन का इंतजाम किया था क्योंकि जहाज छोड़ने के बाद चालक दल के सदस्यों को वेतन नहीं मिला था।
ईरान से निकलने का किस्सा बताते हुए केतन मेहता ने बताया कि दूतावास ने उन्हें ‘एग्जिट वीजा’ (देश छोड़ने का वीजा) दिलाने में मदद की और आर्मेनिया में मौजूद भारतीय अधिकारियों के साथ सम्पर्क किया।
उन्होंने कहा, ”हम एक यात्री वाहन से जुलफा के पास आर्मेनिया की सीमा की ओर निकले। आस-पास के इलाकों में भी मिसाइलें गिर रही थीं। हमने सोचा कि अगर यहां हालात इतने खराब हैं तो बेहतर यही है कि हम सीमा तक पहुंचने की कोशिश करें। भले ही रास्ते में खतरा क्यों न हो।”
केतन ने बताया कि सीमा पर पहुंचने के बाद उनके समूह को कागजी कार्रवाई और मंजूरी के लिए तीन दिन इंतजार करना पड़ा, जिसके बाद आखिरकार 27 मार्च को वे आर्मेनिया में दाखिल हो पाये। इसके बाद वे राजधानी येरेवन पहुंचे जहां से उन्होंने दुबई के लिए उड़ान भरी और फिर वे 29 मार्च को मुंबई पहुंचे।
चालक दल में शामिल रहे मेरठ के रहने वाले कैप्टन विजय कुमार ने बताया कि वह 22 मार्च को ईरान से निकले थे और 29 मार्च को मुंबई तथा 31 मार्च को मेरठ पहुंचे।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”अभी मैं अपने गांव शामली जा रहा हूं, जहां एक पूजा-पाठ का कार्यक्रम है इसलिए मैं अभी इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं बता पाऊंगा।”
मुकेश मेहता ने बताया कि उनका बेटा हाल ही में घर लौटा है और घर जाने से पहले, उसे मुंबई में ‘शिपिंग विभाग’ के दफ्तर में जाकर अधिकारियों को ईरान के ताजा हालात के बारे में जानकारी देने के लिए भी कहा गया था।
मुकेश ने भारत सरकार का भी आभार व्यक्त किया और कहा कि विदेश मंत्रालय तथा विदेश में स्थित भारतीय दूतावासों ने नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में बहुत अहम भूमिका निभाई है।
बहरहाल, तस्करी के आरोपों से लेकर युद्धग्रस्त ईरान में फंसने और जान जोखिम में डालकर वहां निकलने का साहसिक फैसला लेने तक का किस्सा इससे गुजरने वाले हर नाविक की जबान पर है। यह खौफनाक अनुभव इस बात की एक कड़वी याद दिलाता है कि कैसे एक आम-सी यात्रा भी पल भर में जानलेवा मुसीबत में बदल सकती है।
भाषा सं. सलीम जोहेब
जोहेब