तिरुवनंतपुरम, 29 अगस्त (भाषा) इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष केपीए मजीद ने शनिवार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की तारीफ की, जिसके बाद केरलम में सियासी बहस छिड़ गई।
दरअसल, भाकपा राज्य विधानसभा में विपक्ष के उपनेता पद को लेकर विपक्षी गठबंधन वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) में अपनी सहयोगी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के साथ विवाद में उलझी हुई है।
भाकपा के बारे में मजीद की सकारात्मक टिप्पणियों को मीडिया के एक वर्ग ने विपक्षी पार्टी को कांग्रेस-नीत सत्तारूढ़ गठबंधन संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) में शामिल होने के न्योते के रूप में देखा। इसके बाद आईयूएमएल के वरिष्ठ नेता पीके कुन्हालीकुट्टी और पीएमए सलाम को स्पष्ट करना पड़ा कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया है।
आईयूएमएल के मुखपत्र ‘चंद्रिका’ में छपे एक लेख में मजीद ने माकपा पर एलडीएफ में “बड़े भाई” की तरह व्यवहार करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि माकपा समर्थकों को छोड़कर, केरलम की राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात को खारिज कर देगा कि भाकपा नेता महज माकपा के अधीन हैं और आंख बंद करके उसके आदेशों का पालन करते हैं।
मजीद ने कहा कि आधुनिक केरलम के इतिहास में भाकपा की अपनी एक अलग पहचान रही है, जो चुनावी जीत-हार से परे है।
उन्होंने कहा, “कम्युनिस्ट पार्टी के बंटवारे के बाद भी भाकपा दशकों तक सत्ता में रही। उसने मुख्यमंत्री पद संभाला और माकपा के बिना भी सरकार में रही।”
मजीद ने आरोप लगाया कि माकपा के राजनीतिक जाल में फंसने के बाद भाकपा को “बरामदे” में धकेल दिया गया।
उन्होंने कहा कि सी अच्युत मेनन के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में केरलम के विकास की नींव रखी गई, जब मुस्लिम लीग, भाकपा और कांग्रेस ने मिलकर राज्य पर शासन किया था।
मजीद ने कहा, “इसी दौरान शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में मशहूर ‘केरलम मॉडल’ ने आकार लिया।” उन्होंने आरोप लगाया कि माकपा एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसने इस सच्चाई को नजरअंदाज किया है।
आईयूएमएल नेता ने कहा कि मुस्लिम लीग और भाकपा के पुराने राजनीतिक गठबंधन से अलग होने तथा भाकपा के माकपा के साथ जुड़ने के बाद भी दोनों पार्टियों के बीच स्वस्थ आलोचना और बातचीत होती रही, लेकिन उन्होंने कभी भी एक-दूसरे की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला रवैया नहीं अपनाया।
उन्होंने कहा कि किसी खास दल या व्यक्ति के यूडीएफ में शामिल होने या उससे दूर रहने से मोर्चे को न तो कोई खतरा है और न ही उसे इसकी चिंता है।
मजीद ने दावा किया कि मुख्यमंत्री वीडी सतीशन के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार के 100 दिनों के कामकाज ने साबित कर दिया है कि केरलम में यूडीएफ ही “असली वामपंथी” है।
उन्होंने कहा, “माकपा कम से कम यह तो समझती ही है कि सिर्फ एलडीएफ का ठप्पा लगाने से कोई पार्टी वामपंथी नहीं बन जाती।”
हालांकि, सलाम ने इस बात को खारिज कर दिया कि मजीद के लेख का मतलब भाकपा को यूडीएफ में शामिल होने का न्योता देना था।
मल्लप्पुरम में संवाददाताओं से बातचीत में सलाम ने कहा, “मजीद ने बस इस बात की ओर इशारा किया था कि एलडीएफ में भाकपा की अनदेखी की जा रही है।”
आईयूएमएल नेता ने कहा कि ऐसी संभावना (भाकपा का यूडीएफ में शामिल होना) पर तभी चर्चा हो सकती है, जब भाकपा एलडीएफ से अलग होने का फैसला करे। उन्होंने कहा कि भाकपा को खुद तय करना है कि वह अपने सामने खड़े संकट से कैसे निपटेगी।
सलाम ने कहा, “एलडीएफ के टूटने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। फिलहाल यूडीएफ ने केरलम में किसी भी राजनीतिक दल को अपने साथ आने का न्योता नहीं दिया है। मजीद ने अपने लेख में कहीं भी नहीं कहा है कि भाकपा को यूडीएफ से जुड़ जाना चाहिए। इस तरह की चर्चा तभी प्रासंगिक होगी, जब भाकपा एलडीएफ से अलग होने और यूडीएफ के साथ सहयोग करने का फैसला करे।”
कुन्हालीकुट्टी ने भी इस लेख को औपचारिक निमंत्रण के तौर पर देखे जाने की संभावना को खारिज किया।
उन्होंने कहा, “मजीद ने बस यह मुद्दा उठाया है। इस बारे में बातचीत होने दीजिए। यह एकतरफा मामला नहीं है और भाकपा को भी इस पर फैसला लेना होगा।”
कुन्हालीकुट्टी के मुताबिक, “मजीद ने जो कहा, वह अकादमिक नजरिये से था। वह दौर अच्छा था, जब भाकपा, कांग्रेस और मुस्लिम लीग साथ थे।”
मामले में अटकलें और प्रतिक्रियाएं शुरू होने के बाद मजीद ने खुद स्पष्ट किया कि उनके लेख का मकसद यह मांग करना नहीं था कि भाकपा यूडीएफ में लौट आए।
मजीद ने मल्लप्पुरम में संवाददाताओं से कहा, “मेरा लेख इस मांग के साथ नहीं लिखा गया था कि भाकपा को यूडीएफ में वापस आ जाना चाहिए। मैं यह कहने वाला कौन होता हूं कि भाकपा को यूडीएफ में लौट जाना चाहिए। इस बारे में फैसला यूडीएफ आलाकमान को करना है।”
मजीद ने कहा कि उन्हें मौजूदा राजनीतिक हालात में भाकपा के सामने पेश आ रही मुश्किलों की जानकारी है, लेकिन इन मुश्किलों से कैसे निपटना है, यह खुद संबंधित वाम दल को तय करना है।
उन्होंने कहा कि आईयूएमएल का पार्टी (भाकपा) के अंदरूनी मामलों में दखल देने का कोई इरादा नहीं है।
मजीद ने कहा कि उन्होंने भाकपा की “मौजूदा दयनीय स्थिति” को देखते हुए पार्टी के प्रति सिर्फ एकजुटता दिखाई थी।
उन्होंने कहा, “मैंने बस भाकपा की मौजूदा दयनीय स्थिति में उसका साथ दिया। लेख में इसके अलावा और कुछ नहीं है।”
यह लेख और उस पर प्रतिक्रियाएं ऐसे समय में आई हैं, जब केरलम विधानसभा में विपक्ष के उपनेता पद को लेकर भाकपा और माकपा के नेताओं के बीच जुबानी जंग चल रही है।
विपक्ष के नेता पिनराई विजयन ने भाकपा की विपक्ष के उपनेता पद की मांग पिछले हफ्ते ठुकरा दी थी। उन्होंने कहा था कि यह पद माकपा के नेता को ही मिलेगा।
विजयन ने कहा था कि विपक्ष के उपनेता की नियुक्ति के लिए उन्हें विधानसभा अध्यक्ष को बस एक पत्र भेजना है और इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी ओर से माकपा नेता का ही नाम सुझाया जाएगा।
भाकपा के राज्य सचिव बिनॉय विश्वम ने विजयन की टिप्पणी की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि ये बातें उनके पद के अनुरूप नहीं थीं।
विश्वम ने कहा था, “किसी भी नेता को भाकपा के सम्मान का मोल लगाने का अधिकार नहीं है। यह विवाद का विषय है और इसे दोनों पार्टियों के बीच बातचीत के लिए अलग रखा गया है।”
भाकपा के मुखपत्र ‘जनयुगम’ में लिखे एक लेख में पार्टी के वरिष्ठ नेता सत्यन मोकेरी ने विजयन की टिप्पणियों को “गठबंधन के शिष्टाचार का घोर उल्लंघन” करार दिया था। उन्होंने कहा था कि ये टिप्पणियां गठबंधन की राजनीति में अपेक्षित राजनीतिक नैतिकता की कमी को दर्शाती हैं।
हालांकि, माकपा नेता वी शिवनकुट्टी ने भाकपा और मोकेरी पर पलटवार करते हुए कहा था कि गठबंधन के भीतर के मतभेदों को मीडिया के जरिये जाहिर करना राजनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ है।
शिवनकुट्टी ने विजयन के रुख का समर्थन करते हुए इसे “पूरी तरह से लोकतांत्रिक” और व्यावहारिक राजनीतिक सोच पर आधारित बताया था।
भाषा पारुल सुरेश
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