नयी दिल्ली, दो मई (भाषा) हफ़्ते भर बाहर का खाना खाने के बाद जब अंत में उसी सादे दाल-चावल की याद आती है न, वही चिर-परिचित स्वाद जिसे कोई चीज़ बदल नहीं सकती, बस कुछ वैसा ही अहसास है ‘कीर्तन क्लबिंग’। मशहूर गायिका कविता पौडवाल इसे इसी सादगी से समझाती हैं।
पौडवाल कहती हैं कि यह एक ऐसा मंच है जहां हमारी सदियों पुरानी भक्ति और आज के दौर का संगीत एक-दूसरे के गले मिलते हैं, और माहौल बिल्कुल किसी पार्टी जैसा बन जाता है।
यह एक ऐसा प्रारूप है जहां पारंपरिक भक्ति संगीत को आज के आधुनिक साजों के साथ पिरोकर एक ‘पार्टी’ जैसे माहौल में पेश किया जाता है।
भारतीय युवाओं के बीच ‘भजन क्लबिंग’ की यही नयी अवधारणा महज़ एक चलन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक बदलाव है। दशकों से भक्ति संगीत को जी रहीं कविता कहती हैं कि यह तो होना ही था।
वह कहती हैं, ‘कीर्तन क्लबिंग असल में एक ऐसा कोना है जहां आप कीर्तन करते हुए खुद को बहुत हल्का और खुश महसूस करते हैं। यहां आप पार्टी भी कर सकते हैं। यह घर के उस छोटे से हिस्से या घर की उस एक याद जैसा है जिसे हम भागदौड़ में पीछे छोड़ आए थे, लेकिन जिसकी तलाश हमें हमेशा रहती है। जैसे बाहर का चटपटा या ‘जंक फूड’ खाने के बाद आपका मन अंत में घर के सादे दाल-चावल के लिए ही मचलता है।’
आज की ‘जेन-जेड़’ पीढ़ी टेलर स्विफ्ट और के-पॉप (कोरियाई पॉप) की दीवानी है, और कविता इस बात को बखूबी समझती हैं। वह कहती हैं, ‘ईश्वर ने चाहा तो हम भी किसी दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर का ‘प्रोडक्शन’ (संगीत) दे पाएंगे, पर फिलहाल हम कोशिश कर रहे हैं कि संगीत की रफ़्तार आज की हो, लेकिन उसकी रूह वही पुरानी कीर्तन वाली ही रहे।’
मशहूर पार्श्व गायिका अनुराधा पौडवाल की बेटी होने के नाते कविता ने बचपन से ही मंच को करीब से देखा है।
अब वह अपनी इस विरासत को ‘कीर्तन क्लब’ के ज़रिए एक बिल्कुल नयी शक्ल दे रही हैं। यह न तो कोई पारंपरिक सत्संग है और न ही शोर-शराबे वाली क्लबिंग, बल्कि इन दोनों के बीच का एक सुनहरा रास्ता है।
लेकिन क्या इस ‘क्लबिंग’ में पवित्रता बनी रहती है? इस पर कविता बड़ी बेबाकी से जवाब देती हैं, ‘देखिए, बात चाहे जो भी हो, है तो यह कीर्तन ही। इसलिए इसकी मर्यादा सबसे ऊपर है। हम चाहते हैं कि यहां पूरा परिवार एक साथ आए। जब साथ में परिवार होता है, तो एक शालीनता खुद-ब-खुद आ जाती है, जो कि अच्छी बात है।’
वह इस अंदाज़ को लोकतांत्रिक मानती हैं। कविता कहती हैं कि यह किसी औपचारिक ‘कॉन्सर्ट’ जैसा नहीं है जहां गायक और सुनने वाले के बीच एक दीवार हो, बल्कि यह उत्तर भारत के उस जगराते जैसा है जिसमें हर कोई शामिल होता है। वह पुरानी यादों में खोते हुए कहती हैं, ‘मैं जगरातों के बीच ही पली-बढ़ी हूं। वहां जो जोश और शोर होता था, वह सबको अपने साथ बहा ले जाता था। भक्ति का मतलब सिर्फ शांत रहना नहीं, बल्कि जमकर उत्सव मनाना भी है।’
विदेशों में पढ़ाई या काम कर रहे भारतीय युवाओं में अपनी जड़ों की ओर लौटने की जो एक छटपटाहट दिखी है, उसने कविता को बहुत प्रभावित किया है।
वह मानती हैं कि जब आप बाहर की दुनिया देख लेते हैं, तब आपको समझ आता है कि आपके भीतर का एक हिस्सा अपनी संस्कृति से मज़बूती से जुड़ा होना चाहिए।
वह कहती हैं, ‘आज के बच्चे हर बात के पीछे का ‘क्यों’ जानना चाहते हैं। वे पूछते हैं कि हमारी परंपराओं का आधार क्या है, और यकीन मानिए, जब उन्हें अपनी संस्कृति के इन सवालों के जवाब मिल जाते हैं, तो फिर वे अपनी जड़ों को इतनी मज़बूती से थाम लेते हैं कि उन्हें उस विश्वास से डिगाना नामुमकिन हो जाता है।’
कविता की योजना अब इसे देश के हर कोने में ले जाने की है। साल भर में 52 शो करने का बड़ा लक्ष्य लेकर वह निकल पड़ी हैं, जिसकी पहली झलक रविवार को मुंबई के जुहू में दिखेगी।
उनके पहले कार्यक्रम का मुख्य विषय है – ‘उत्तर से दक्षिण तक कृष्ण’। इस बारे में वह कहती हैं, ‘पूजा के ढंग, नाम या भाषा भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उस ऊपर वाले को पुकारने का जो भाव है, जो रूहानी अहसास है, वो तो हर जगह एक सा ही है। ‘कीर्तन क्लबिंग’ बस इसी एक पुकार को आज की लय में पिरोने की कोशिश है।’
भाषा सुमित वैभव
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