उच्चतम न्यायालय की विशेष लोक अदालत में कई लंबित मामलों का निपटारा किया गया

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उच्चतम न्यायालय की विशेष लोक अदालत में कई लंबित मामलों का निपटारा किया गया

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  • Publish Date - August 26, 2026 / 05:46 PM IST,
    Updated On - August 26, 2026 / 05:46 PM IST

नयी दिल्ली, 26 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय में आयोजित मेगा लोक अदालत की बदौलत लंबे समय से लंबित कई विवादों का निपटारा हो गया। इनमें 47 साल पुराना किरायेदारी विवाद, 1978 से लंबित एक वाणिज्यिक मामला और अयोध्या का संपत्ति विवाद शामिल हैं।

अयोध्या के संपत्ति विवाद का समाधान दुबई से भेजे गए डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित समझौते की मदद से किया गया।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उच्चतम न्यायालय में 96 हजार से अधिक मामले लंबित हैं जिनमें 10,000 से ज्यादा मामले एक दशक से भी अधिक समय से निपटारे का इंतजार कर रहे हैं।

समाधान समारोह 2026 पहल के समापन के मौके पर 21 से 23 अगस्त तक आयोजित तीन दिवसीय विशेष लोक अदालत में 1,712 मामलों का निपटारा किया गया, जिनमें 48 मामलों का समाधान मध्यस्थता के जरिये हुआ। लोक अदालत में सूचीबद्ध 3,285 मामलों में से 1,664 मामलों का निपटारा या समाधान किया गया जबकि 240.94 करोड़ रुपये की राशि वितरित की गई।

सबसे उल्लेखनीय समझौतों में से एक 1978 से चले आ रहे एक वाणिज्यिक विवाद का निपटारा था।

सऊदी अरब की कंपनी ‘अल मुस्तनीर एस्टैब्लिशमेंट फॉर ट्रेड’ और अब केनरा बैंक का हिस्सा बन चुके सिंडिकेट बैंक के बीच विवाद लगभग 6.8 लाख अमेरिकी डॉलर मूल्य के 2,000 मीट्रिक टन एमएस राउंड बार की आपूर्ति के एक ‘ऑर्डर’ से जुड़ा था।

यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय से होते हुए अंततः 2017 में उच्चतम न्यायालय पहुंचा। दशकों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद इस मामले को ‘समाधान समारोह’ के तहत निपटारे के लिए चुना गया।

दोनों पक्षों ने इस वर्ष जुलाई में मध्यस्थता केंद्र में मध्यस्थता प्रक्रिया में हिस्सा लिया और लगातार चली बातचीत के बाद आपसी सहमति से समझौते पर पहुंच गये। तय की गई राशि का भुगतान कर दिया गया और लगभग पांच दशक पुराने इस विवाद का आखिरकार निपटारा कर दिया गया।

एक अन्य मामले में, दुबई और अयोध्या में रह रहे दोनों पक्षों के बीच की दूरी को पाटने में तकनीक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अयोध्या की कृषि भूमि से जुड़ा दशकों पुराना मामला लोक अदालत के दौरान सुलझा लिया गया। भारत में मौजूद पक्षकारों ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से संपत्ति के बंटवारे पर बातचीत की, लेकिन दुबई में रहने वाले प्रतिवादी मोहम्मद तौसीफ इसमें व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं हो सके।

उन्होंने दुबई में हिंदी में तैयार समझौता विलेख का प्रिंट निकाला, उस पर हस्ताक्षर किए और उसकी स्कैन की हुई प्रति व्हाट्सएप के जरिए भारत में अपने कानूनी प्रतिनिधियों को भेज दी। इससे समझौते की प्रक्रिया पूरी हो सकी।

समझौते के तहत, अपीलकर्ताओं को संपत्ति के उत्तरी हिस्से में 53 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा, जबकि प्रतिवादियों को दक्षिणी हिस्से में 47 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। दोनों पक्षों ने संपत्ति के पश्चिमी हिस्से में स्थित रास्ते का संयुक्त रूप से इस्तेमाल करने पर भी सहमति जताई।

एक अन्य उल्लेखनीय समझौते के तहत जयपुर की एक दुकान से जुड़ा 47 साल पुराना किरायेदारी विवाद समाप्त हो गया।

यह विवाद 1952 के किरायेदारी मामले से जुड़ा था। मकान मालिक ने 1979 में किरायेदार को बेदखल करने की कार्यवाही शुरू की और यह मामला अंततः 2017 में उच्चतम न्यायालय पहुंचा।

मकान मालिक द्वारा 2003 में दुकान अपीलकर्ता को बेचने पर सहमति जताने और बिक्री की कुछ रकम का भुगतान हो जाने के बावजूद, दो दशकों से अधिक समय तक मुकदमेबाजी जारी रही।

डीएलएसए, जयपुर की मध्यस्थता से ‘समाधान समारोह’ के दौरान दोनों पक्ष आखिरकार समझौते पर पहुंचे। इसके तहत प्रतिवादी ने आपसी सहमति से तय की गई राशि पर विवादित दुकान अपीलकर्ता को बेचने पर सहमति जताई।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस पहल से आपसी सहमति से विवादों के समाधान के कई फायदे सामने आए हैं। इनमें मुकदमेबाजी में लगने वाले समय और खर्च में कमी, पक्षकारों को अधिक निश्चितता और अंतिम समाधान मिलना, लंबित मामलों की संख्या कम होना तथा न्यायिक समय की बचत शामिल है।

भाषा देवेंद्र नरेश

नरेश