गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा देने के लिए नये कानून की आवश्यकता है: विधि विशेषज्ञ

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गाय को 'राष्ट्रीय पशु' का दर्जा देने के लिए नये कानून की आवश्यकता है: विधि विशेषज्ञ

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  • Publish Date - May 26, 2026 / 09:15 PM IST,
    Updated On - May 26, 2026 / 09:15 PM IST

नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) प्रमुख मुस्लिम संगठनों द्वारा गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा दिये जाने की मांग के बीच मंगलवार को एक विधि विशेषज्ञ ने कहा कि यदि ऐसा कोई कदम उठाया जाता है, तो इसके लिए वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की तरह एक कानून बनाना होगा।

विधि विशेषज्ञ ने बताया कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम ‘रॉयल बंगाल टाइगर’ (बाघ) को इस तरह का दर्जा देता है, जिसके अवैध शिकार या मारने पर सख्त सजा का प्रावधान है।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के लिए पर्यावरण और वन मंत्रालय जिम्मेदार है।

विधि विशेषज्ञ के अनुसार, यदि गाय को देश के ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा दिया जाता है, तो उसके संरक्षण के लिए भी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की तरह के प्रावधान बनाने होंगे। गाय को देश में पवित्र माना जाता है।

कानूनी विशेषज्ञ का क्या कहना है:

पूर्व केंद्रीय कानून सचिव पी. के. मल्होत्रा ​​ने चेतावनी दी कि ऐसा कानून बनाने से पहले इसके कारण और प्रभाव पर विचार करना आवश्यक होगा।

उन्होंने कहा कि ऐसे कानून की कोई ‘व्यावहारिक उपयोगिता’ नहीं होगी और यह केवल ‘प्रतीकात्मक’ प्रकृति का होगा।

भारतीय विधि सेवा के पूर्व अधिकारी मल्होत्रा ​​ने कहा कि केंद्र सरकार में काम के बंटवारे को देखते हुए, यदि यह कानून लाया जाता है तो मत्स्य पालन, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन मंत्रालय इसके लिए नोडल एजेंसी हो सकता है।

पूर्व कानून सचिव ने संविधान के अनुच्छेद 48 का उल्लेख करते हुए कहा कि कई राज्यों ने इसके प्रावधानों के आधार पर स्थानीय कानून बनाकर गोहत्या पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है।

उन्होंने कहा कि कुछ राज्य “फिट फॉर स्लॉटर” (वध के लिए उपयुक्त) सिद्धांत के आधार पर गायों के वध की अनुमति देते हैं, जिसके तहत जो गायें बूढ़ी हो जाती हैं या दूध नहीं देतीं, उन्हें वध के लिए उपयुक्त माना जाता है।

अनुच्छेद 48 में लिखा है, ‘राज्य आधुनिक और वैज्ञानिक तर्ज पर कृषि और पशुपालन को संगठित करने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू एवं भार ढोने वाले पशुओं की नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाएगा तथा उनके वध पर रोक लगाएगा।’

उन्होंने कहा कि राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों के एक अन्य प्रावधान (अनुच्छेद 44) के आधार पर अब कई राज्य समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से संबंधित अपने-अपने कानून या नियम बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

केंद्र सरकार का पक्ष:

हालांकि, केंद्र सरकार की गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने के लिए कानून बनाने की कोई योजना नहीं है। यह केंद्रीय मत्स्य, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री एस पी सिंह बघेल ने 12 अगस्त 2025 को संसद में बताया था।

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने मुसलमानों को ईद-उल-अजहा के दौरान गाय की कुर्बानी नहीं देने की अपील की है और केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह जमीयत उलेमा-ए-हिंद प्रमुख मौलाना अरशद मदनी के सुझाव पर विचार करते हुए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे।

उन्होंने कहा कि धर्म में कहीं यह नहीं लिखा है कि गाय की कुर्बानी दी जानी है और यह भी कहा कि ऐसा कोई भी कार्य जिससे अन्य नागरिकों को कष्ट या असुविधा हो, उससे बचना चाहिए।

बाघ और मोर का दर्जा:

रॉयल बंगाल टाइगर को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित किया गया है, जहां इसे अनुसूची-1 पशु के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

भारत की संसद की वेबसाइट- डिजिटल संसद के अनुसार, इस कानूनी दर्जे के तहत बाघ को भारत में शिकार और वाणिज्यिक व्यापार के खिलाफ उच्चतम स्तर का वैधानिक संरक्षण प्राप्त है।

बाघ को अप्रैल 1972 में राष्ट्रीय वन्य पशु घोषित करने की सिफारिश राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने की थी, जिसके बाद उसने एशियाई शेर की जगह यह दर्जा प्राप्त किया था।

इसी प्रकार, मोर भी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल है, जिससे इसे भी उच्चतम कानूनी संरक्षण प्राप्त है। मोर को 1963 में भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था और इसे नुकसान पहुंचाना गंभीर अपराध माना जाता है।

अधिनियम की धारा-नौ के तहत मोर का शिकार, उसे पकड़ने या मारने पर पूर्ण प्रतिबंध है।

भाषा अमित सुरेश

सुरेश