नयी दिल्ली, एक मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि 2020 में दिल्ली में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शन को लेकर भारतीय जनता पार्टी नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के कथित रूप से नफरत फैलाने वाले भाषणों के मामले में उनके खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
सांसद ठाकुर पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं तथा वर्मा दिल्ली सरकार में मंत्री हैं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने नफरत फैलाने वाले भाषणों से संबंधित याचिकाओं पर 29 अप्रैल को दिए अपने फैसले में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेताओं वृंदा करात और के. एम. तिवारी की उस याचिका पर भी विचार किया जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के जून 2022 के फैसले को चुनौती दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने करात और तिवारी की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए विरोधी प्रदर्शन को लेकर ठाकुर और वर्मा के भाषणों के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने से अधीनस्थ अदालत के इनकार करने को चुनौती दी गई थी।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उच्च न्यायालय ने स्वतंत्र आकलन के आधार पर माना था कि भाषणों से किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं होता। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि ये बयान किसी खास समुदाय के खिलाफ नहीं थे और न ही उन्होंने हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था के लिए उकसाया।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘कथित भाषणों, अधीनस्थ अदालत के समक्ष 26 फरवरी, 2020 को पेश स्थिति रिपोर्ट और अदालतों द्वारा दर्ज कारणों समेत रिकॉर्ड में रखी गई सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष से सहमत हैं कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।’’
माकपा नेताओं ने आरोप लगाया था कि 27 जनवरी, 2020 को ठाकुर ने रिठाला में एक रैली में नफरत फैलाने वाला भाषण दिया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि 28 जनवरी, 2020 को वर्मा ने भी भड़काऊ भाषण दिया था।
अधीनस्थ अदालत ने 26 अगस्त 2020 को याचिकाकर्ताओं की शिकायत इस आधार पर खारिज कर दी थी कि सक्षम प्राधिकारी से अपेक्षित मंजूरी नहीं ली गई थी इसलिए शिकायत विचार योग्य नहीं है।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उच्च न्यायालय ने इस आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धाराओं 196 और 197 के तहत पूर्व स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई थी।
पीठ ने कहा कि पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की व्यवस्था में संज्ञान से पहले के चरण में प्राथमिकी दर्ज करने या जांच करने के निर्देश पर कोई रोक नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘इसके विपरीत कोई भी निष्कर्ष निकालना ऐसी रोक लगाने जैसा होगा, जिसकी विधायिका ने कल्पना नहीं की है।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘इसलिए मंजूरी की आवश्यकता केवल संज्ञान लेने के लिए पूर्व शर्त है, प्राथमिकी दर्ज करने या जांच करने के लिए नहीं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, पूर्व मंजूरी के मुद्दे पर उच्च न्यायालय द्वारा अपनाए गए तर्क से हम असहमति जताते हैं, लेकिन हमें अंतिम निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नजर नहीं आता।’’
याचिकाओं के समूह पर अपने 125 पृष्ठों के फैसले में पीठ ने कहा कि नफरत फैलाने वाला भाषण भाईचारे के संवैधानिक मूल्य के ‘मौलिक रूप से विपरीत’ है और ‘‘हमारे गणतंत्र के नैतिक ताने-बाने पर प्रहार’’ करता है, लेकिन ऐसे मामलों को लेकर ऐसा कोई ‘‘विधायी शून्यता’’ नहीं है, जिसमें हस्तक्षेप की जरूरत हो, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था इस मुद्दे से पर्याप्त रूप से निपटती है।
भाषा सिम्मी अविनाश
अविनाश