नयी दिल्ली, 22 अप्रैल (भाषा) सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) संबंधी नियमों को और सख्त करने का प्रस्ताव दिया है और इस बार खास तौर पर जोर दिया गया है कि उपयोगकर्ता एआई से बनी सामग्री की पहचान ऑनलाइन कैसे कर सकते हैं।
इस बारे में जानना जरूरी है कि इस नए प्रस्ताव में क्या शामिल है, यह क्यों जरूरी है, और डिजिटल अधिकार समूहों द्वारा आईटी नियमों में किए जा रहे संशोधनों पर क्या चिंताएं जताई जा रही हैं, जिन पर अभी विचार चल रहा है।
प्रस्तावित मुख्य बदलाव:
——————-
फिलहाल आईटी नियमों के मुताबिक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से निर्मित सामग्री पर लेबल या निशान साफ-साफ दिखने चाहिए।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने मंगलवार को आम लोगों की राय जानने के लिए संशोधनों का जो मसौदा जारी किया है, उसमें ‘साफ-साफ दिखने’ वाली शर्त को बदलकर यह नियम लागू करने की बात कही गई है कि लेबल ‘‘स्क्रीन पर पूरे समय लगातार और साफ-साफ दिखते रहने चाहिए’’।
आसान शब्दों में कहें तो, इसका मतलब यह है कि एआई से बनी सामग्री की पहचान बताने वाला वॉटरमार्क या लेबल सिर्फ़ वीडियो की शुरुआत या आखिर में ही नहीं दिखना चाहिए; बल्कि यह पूरे वीडियो के दौरान स्क्रीन पर बने रहना चाहिए।
प्रस्तावित नियम के अनुसार ऐसी स्थिति नहीं होगी जिसमें लेबल ‘‘कभी दिखे, कभी न दिखे’’। मंत्रालय यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अगर कोई वीडियो एआई से बनाया गया है, तो देखने वाले को, यह बात वीडियो के पहले सेकंड से लेकर आखिरी सेकंड तक पता रहे।
ऐसा क्यों किया जा रहा है:
——————-
इसकी मुख्य वजह है एआई का बढ़ता दुरुपयोग। मंत्रालय का मानना है कि ऑनलाइन दिखने वाले ऐसे वीडियो जो असली जैसे लगते हैं, लेकिन असल में नकली होते हैं, उनसे गलत जानकारी फैलती है और उपयोगकर्ता गुमराह होते हैं। इसलिए, एआई टूल से बनी ऐसी सामग्री को शुरू में ही लेबल लगाकर या निशान लगाकर पहचानना जरूरी है।
हमेशा दिखने वाला लेबल अनिवार्य करके, सरकार यह पक्का करना चाहती है कि अगर कोई देखने वाला वीडियो को बीच में से भी देखना शुरू करे या क्लिप के किसी भी हिस्से में देखे, तो उसे तुरंत पता चल जाए कि यह कंटेंट असली नहीं, बल्कि एआई से बनाया गया है।
मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि पहले के नियम के मुताबिक ‘साफ-साफ दिखने वाले’ लेबल को लेकर अनुपालन संतोषजनक नहीं था।
कल्पना कीजिए, पांच मिनट का एआई से बना एक वीडियो है, जिसमें लेबल सिर्फ शुरुआती 5 सेकंड के लिए ही दिखता है। अगर आप वीडियो को दो मिनट बाद देखना शुरू करते हैं, तो आप एआई का निशान देख ही नहीं पाएंगे और हो सकता है कि आप उसे सच मान लें। अधिकारियों का तर्क है कि ‘हमेशा दिखते रहने वाला’ निशान ज़्यादा व्यावहारिक है और इसमें ज़्यादा पारदर्शिता भी है।
सोशल मीडिया मंच-एक्स, यूट्यूब और मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि ये लेबल हमेशा बने रहें। एआई से सामग्री विकसित करने के टूल बनाने वाली कंपनियों को यह सतत लेबलिंग प्रणाली अपनानी होगी।
अन्य प्रस्तावित प्रावधान जो विवाद के विषय बनकर उभरे हैं:
सोशल मीडिया मंचों के लिए मंत्रालय द्वारा जारी सलाहों का अनिवार्य पालन करना। सरकार का प्रस्ताव है कि मंचों के लिए स्पष्टीकरण, सलाह, एसओपी और दिशानिर्देशों का पालन करना कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए।
इन्फ्लुएंसर संबंधी नियम: गैर-प्रकाशक उपयोगकर्ताओं (यानी इन्फ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर) द्वारा पोस्ट किए गए ‘समाचार और समसामयिक विषयों की सामग्री’ को जल्द ही उसी कानूनी ढांचे का पालन करना पड़ सकता है, जैसा कि पंजीकृत डिजिटल समाचार पोर्टल के लिए लागू है।
सरकार ने हितधारकों (प्लेटफॉर्म, नागरिक समाज और आम जनता) के लिए इन प्रस्तावों पर अपनी प्रतिक्रिया जमा करने की समय सीमा बढ़ाकर 7 मई, 2026 कर दी है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा है कि प्राप्त प्रतिक्रियाओं को गोपनीय रखा जाएगा; इसका अर्थ है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष राय को बढ़ावा देने के लिए, टिप्पणी करने वालों की पहचान उजागर नहीं की जाएगी। परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद, सरकार संशोधित आईटी नियमों के अंतिम मसौदे पर अपना निर्णय लेगी।
भाषा वैभव अविनाश
अविनाश