मानव कल्याण के लिए हुई धर्म की स्थापना : खरगे

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मानव कल्याण के लिए हुई धर्म की स्थापना : खरगे

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  • Publish Date - April 22, 2026 / 07:43 PM IST,
    Updated On - April 22, 2026 / 07:43 PM IST

बीदर (कर्नाटक), 22 अप्रैल (भाषा) कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बुधवार को कहा कि मनुष्य धर्म के लिए जन्म नहीं लेता; बल्कि धर्मों की स्थापना मानव कल्याण के लिए की गई है।

वह बीदर जिले के भालकी में श्री चन्नबासावाश्रम में हिरेमठ संस्थान के डॉ. बसवलिंग पट्टादेवरु महास्वामीजी की 75वीं जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे।

खरगे ने कहा, “हर किसी को एक मानव समुदाय के रूप में एकजुट होना चाहिए। धर्म आवश्यक है। मनुष्य धर्म के लिए जन्म नहीं लेता; धर्म की स्थापना मानव कल्याण के लिए की गई है। जब तक आप इसे नहीं समझेंगे, तब तक आप प्रगति नहीं कर सकते।”

इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन, राज्यपाल थावरचंद गहलोत और कर्नाटक के मंत्री ईश्वर खंड्रे सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

उन्होंने कहा कि 12वीं शताब्दी के समाज सुधारक बसवन्ना ने ‘मनुवाद’ और ‘चतुर्वर्ण’ (सामाजिक ढांचा) को अस्वीकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि बसवन्ना ने इनका विरोध कर सभी जातियों के लोगों को एकजुट करते हुए एक नयी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना की।

खरगे ने कहा कि बसवन्ना ने अनुभव मंडप की स्थापना की, जिसे प्रथम आध्यात्मिक संसद माना जाता है, जिसके प्रमुख पिछड़े समुदाय के नेता अल्लामा प्रभु थे। उन्होंने कहा, ‘‘जब तक हम यह नहीं कहते कि हम सब एक हैं, तब तक कोई भी धर्म विकसित नहीं हो सकता।’’

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि कभी भारत और अन्य देशों में बौद्ध धर्म काफी प्रचलित था तथा कई देशों में फलने-फूलने के बावजूद, इसे अपने मूल देश में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, “बसवन्ना की शिक्षाओं के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। इसे ध्यान में रखते हुए, हमें उनके दर्शन को बढ़ावा देना चाहिए।”

खरगे ने कहा कि वह बुद्ध, बसवन्ना, आंबेडकर, नारायण गुरु और कबीर का अनुसरण करते हैं और ये सभी मानवतावादी विद्वान थे जिन्होंने समाज के कल्याण के लिए काम किया।

उन्होंने कहा कि समाज में अंधविश्वास काफी फैला हुआ है।

खरगे ने कहा, “एक नेता के रूप में, मैं कुछ बातें नहीं कह सकता। अगर मैं कुछ कहता हूं, तो वह खबर बन जाती है। मैं जो कहता हूं और अखबारों या टीवी पर जो आता है, वह अक्सर भिन्न होता है, इसलिए मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा।”

भाषा अविनाश पवनेश

पवनेश