आघात उपचार का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग : उच्चतम न्यायालय

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आघात उपचार का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग : उच्चतम न्यायालय

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  • Publish Date - May 28, 2026 / 03:42 PM IST,
    Updated On - May 28, 2026 / 03:42 PM IST

नयी दिल्ली, 28 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि नागरिकों के लिए आघात उपचार (ट्रॉमा केयर) का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है, और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर आपातकालीन प्रतिक्रियाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर ‘112’ शुरू करने के साथ ही कार्यात्मक शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करनी चाहिए।

न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदूरकर की पीठ ने राज्यों को यह निर्देश भी दिया कि वे मासिक बैठकें आयोजित करें और उनकी कार्यवाही का ब्योरा संबंधित पोर्टल पर अपलोड करके समय-समय पर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

पीठ ने यह आदेश ‘सेवलाइफ फाउंडेशन’ द्वारा दायर याचिका पर मंगलवार को पारित किया, जिसमें भारतीय सार्वजनिक कानून प्रणाली में आघात उपचार (ट्रॉमा केयर) को एक अधिकार के रूप में मान्यता देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी दुर्घटना या ऐसी ही किसी घटना का शिकार होता है जिसमें तत्काल उपचार की आवश्यकता होती है, तो वह आमतौर पर सदमे और घबराहट की स्थिति में होता है। इसने कहा कि वह उस समय असहाय महसूस करता है और उसे बस यही उम्मीद होती है कि उसके आसपास के लोग किसी तरह उसे वह उपचार दिलाने में मदद करेंगे जिसकी उसे जरूरत है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘ऐसी स्थिति में, चिकित्सा सहायता या तत्काल देखभाल के बिना बिताया गया हर मिनट जीवित रहने की संभावना को काफी कम कर देता है। शीघ्रता वास्तव में दवा की तरह है।’’

पीठ ने कहा कि आमतौर पर, चाहे किसी की मदद करने की तीव्र इच्छा हो या न हो, संबंधित स्थान पर खड़ा व्यक्ति झिझकता है, प्रतिक्रियात्मक रूप से निष्क्रिय हो जाता है, कभी-कभी कानूनी कार्यवाही के डर से, गवाह के रूप में थाने में बुलाए जाने के डर से और कभी-कभी स्थिति के मनोवैज्ञानिक भार के कारण।

न्यायालय ने कहा, ‘‘इन बाधाओं को दूर करने के लिए, एक व्यवस्थित हस्तक्षेप, आघात देखभाल के लिए एक समान ढांचा तैयार करना, जन-जागरूकता बढ़ाना, प्राथमिक चिकित्सा कौशल का मानकीकरण और उचित सहायता कानूनों की आवश्यकता है; क्योंकि नागरिकों का आघात उपचार का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है।’’

इसने केंद्र को तीन महीने के भीतर आघात संबंधी मामलों के लिए एक चिकित्सा बचाव प्रोटोकॉल जारी करने की अनुमति दी और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों से इसके तीन महीने के भीतर इसे लागू करने को कहा।

पीठ ने केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को आठ सप्ताह के भीतर ‘ट्रॉमा रजिस्ट्री’ के लिए आवश्यक डेटा प्रारूप निर्धारित करने वाले दिशानिर्देश जारी करने का निर्देश दिया।

भाषा

नेत्रपाल नरेश

नरेश