नयी दिल्ली, 24 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने आगामी राष्ट्रीय जनगणना में गैर अधिसूचित खानाबदोश जनजातियों को एक अलग श्रेणी के रूप में शामिल करने के लिए निर्देश देने संबंधी जनहित याचिका पर सुनवाई करने से मंगलवार को इनकार कर दिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस तरह के वर्गीकरण सरकारी नीति के दायरे में आते हैं और इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। पीठ ने याचिका का निपटारा कर दिया और याचिकाकर्ता दक्षिणकुमार बजरंग को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के समक्ष आवेदन करने की अनुमति दी।
इस याचिका में जनगणना आयुक्त को यह सुनिश्चित करने का आदेश देने का अनुरोध किया गया कि जनगणना के दौरान गैर-अधिसूचित खानाबदोश जनजातियों के सदस्यों की विशेष रूप से पहचान की जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि याचिका अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा नहीं मांग रही है, बल्कि जनगणना में उनकी उपस्थिति दर्ज कराने की मांग कर रही है। दवे ने कहा, ‘‘चूंकि (आपराधिक जनजाति) अधिनियम अब लागू नहीं है…इसलिए कोई न कोई ऐसा तरीका होना चाहिए, जिससे वे जनगणना से बाहर न रह जाएं।’’
प्रधान न्यायाधीश ने याचिका के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘‘हम एक अनोखा देश हैं। वर्गहीन समाज बनाने के बजाय, हम यहां और अधिक वर्ग बनाने की ओर अग्रसर हैं।’’
उन्होंने कहा कि यदि जांच की जाती है, तो जनहित याचिका के स्रोत का पता लगाया जा सकता है और यह संभव है कि यह देश के बाहर के लोगों से प्रभावित हो।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ये बहुत सोची-समझी चालें हैं…यह याचिका समाज को बांटने की एक गहरी साजिश है। ये सब भारत से नहीं हो रहा है और अगर हम जांच करेंगे, तो पता चलेगा कि ये सब कहां से आ रहा है।’’
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि जनगणना विशेषज्ञों का मामला है। न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह एक विशेषज्ञ नीतिगत निर्णय है। हमें देखना होगा कि सरकार उनके लिए क्या वर्गीकरण करती है।’’
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अदालत में आने से मात्र एक महीने पहले ही अधिकारियों को आवेदन प्रस्तुत किया था।
पीठ ने कहा, ‘‘हमारी राय में, जनगणना प्रक्रिया के दौरान वर्गीकरण या उप-वर्गीकरण मूलतः नीतिगत क्षेत्र में आता है, जिस पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए। इस मुद्दे को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।’’
जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए पीठ ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित सरकारी अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायतें रखने की स्वतंत्रता देकर याचिका का निपटारा कर दिया।
भाषा आशीष दिलीप
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