नयी दिल्ली, 21 जनवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने एक मजिस्ट्रेट के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें स्वास्थ्य कारणों को लेकर व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगने संबंधी एक व्यक्ति की याचिका को खारिज कर दिया गया था।
अदालत ने कहा कि न्याय तक सुगम पहुंच को प्रक्रियात्मक दुरुपयोग का लाइसेंस नहीं माना जाए और अपील की तुच्छ प्रक्रृति को ध्यान में रखते हुए अपीलकर्ता पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुज अग्रवाल ने यह भी कहा कि यह मामला एक ऐसे वादी का सटीक उदाहरण है, जिसने आवश्यकता पड़ने पर अदालत से राहत तो मांगी, लेकिन अनुपालन की आवश्यकता होने पर अदालत के प्राधिकार के प्रति बहुत कम सम्मान दिखाया।
अदालत हिम्मत सिंह नाम के व्यक्ति की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसने चिकित्सा कारणों से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगने संबंधी उसकी याचिका को खारिज करने वाले मजिस्ट्रेट अदालत के दिसंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी थी।
मजिस्ट्रेट ने याचिका खारिज कर दी थी और मार्च 2023 के आदेश के क्रियान्वयन में उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया था।
अदालत ने 20 जनवरी के एक आदेश में कहा, ‘‘स्वास्थ्य कारणों से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट कोई अधिकार नहीं, बल्कि विवेकाधीन छूट है जो विश्वसनीय सबूतों पर आधारित होनी चाहिए। अपीलकर्ता (सिंह) इस मूलभूत दायित्व को पूरा करने में विफल रहा।’’
अदालत ने साक्ष्यों पर विचार करते हुए कहा कि इससे पहले सिंह के विरुद्ध जारी कुर्की वारंट बिना तामील किये वापस कर दिए गए थे, साथ ही यह रिपोर्ट भी दी गई थी कि उनका घर बंद था और वह उसे छोड़कर चले गए थे।
अदालत ने कहा कि यह आचरण कानून की प्रक्रिया से बचने का प्रयास दर्शाता है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यह मामला एक ऐसे वादी का सटीक उदाहरण है जो अपना फायदा होने की स्थिति में अदालत की सहायता तो लेता है, लेकिन अनुपालन की आवश्यकता होने पर अदालत के अधिकार के प्रति बहुत कम सम्मान दिखाता है।
अपील को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि सिंह का आचरण वैध न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन के प्रति एक लापरवाह और बाधक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
न्यायाधीश ने कहा कि अपील का इस्तेमाल, एक वास्तविक कानूनी शिकायत के निवारण के प्रयास के बजाय, देर करने और क्रियान्वयन को विफल करने के लिए किया गया।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘न्याय तक सुगम पहुंच को प्रक्रियात्मक दुरुपयोग करने की छूट नहीं समझा जा सकता। क्रियान्वयन को रोकने के लिए दायर की गई तुच्छ अपीलें न केवल डिक्री धारक को परेशान करती हैं बल्कि न्याय प्रणाली को भी बाधित करती हैं, जिससे वास्तविक वादियों को समय पर निर्णय से वंचित होना पड़ता है।’’
भाषा सुभाष माधव
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