कोलकाता, 28 जून (भाषा) पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 15 साल के शासन को समाप्त करने के दो महीने से भी कम समय बाद भाजपा सरकार सोमवार को विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पेश कर सकती है। इससे चुनाव के बाद की पहली बड़ी वैचारिक बहस के शुरू होने की संभावना है।
इस प्रस्तावित कानून का मकसद शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों के लिए धर्म से परे एक समान नागरिक प्रारूप बनाना है। उम्मीद है कि यह मौजूदा बजट सत्र में चर्चा का मुख्य विषय रहेगा और पहचान, समानता, धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक अधिकारों और ‘पर्सनल कानून’ व राज्य के अधिकार के बीच संबंधों पर व्यापक बहस का आधार बनेगा।
भाजपा के लिए यह विधेयक उसके मुख्य चुनावी वादे को पूरा करने और इस लंबे समय से चली आ रही बात को दोहराने जैसा है कि सभी नागरिकों पर एक जैसे नागरिक कानून लागू होने चाहिए।
वहीं विपक्ष के लिए यह सामाजिक सहमति, संवैधानिक सुरक्षा और इस बात पर सवाल उठाता है कि क्या अलग-अलग समुदायों पर असर डालने वाले सुधार को बिना व्यापक बातचीत के लागू किया जा सकता है।
यह कदम विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के ‘संकल्प पत्र’ में वादे के तहत तय की गई छह महीने की समय-सीमा से काफी पहले उठाया जा रहा है।
घोषणा-पत्र जारी करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वादा किया था कि भाजपा सरकार सत्ता में आने के छह महीने के भीतर पश्चिम बंगाल में यूसीसी लागू करेगी।
उन्होंने इसे आस्था से परे कानून के सामने समानता सुनिश्चित करने के उपाय के तौर पर पेश किया था।
इस कानून का मकसद शादी, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में धर्म-आधारित ‘पर्सनल कानून’ की जगह सभी नागरिकों पर लागू होने वाला एक समान कानूनी प्रारूप तैयार करना है, साथ ही कुछ खास वर्गों को मिली संवैधानिक छूट को बनाए रखना है।
शुक्रवार को शुभेंदु अधिकारी ने संकेत दिया कि सरकार मौजूदा सत्र में इस कानून को आगे बढ़ाने का इरादा रखती है।
उन्होंने कहा, ‘‘जिस तरह से गुजरात, उत्तराखंड और असम में एक प्रक्रिया का पालन करते हुए इसे (यूसीसी) लागू किया गया , उसी तरह पश्चिम बंगाल में भी इसे लागू किया जाएगा। मैं सोमवार को विधानसभा को इस बारे में जानकारी दूंगा।’’
उनके इन बयानों से यह साफ संकेत मिलता है कि भाजपा सरकार अपने प्रमुख चुनावी वादों में से एक पर तेजी से आगे बढ़ना चाहती है और बंगाल के लिए वैसा ही प्रारूप तैयार करना चाहती है जैसा दूसरे भाजपा-शासित राज्यों में अपनाया गया है।
विधेयक पेश किए जाने से पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने इस प्रस्ताव से जुड़ी मुख्य चिंताओं में से एक को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि संविधान के तहत सुरक्षित आदिवासी समुदाय इसके दायरे से बाहर रहेंगे।
शुक्रवार को पार्टी के विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के साथ हुई बैठक में टीएमसी अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी को निर्देश दिया कि वे विधानसभा के अंदर और बाहर इस विधेयक का जोरदार विरोध करें।
उन्होंने तर्क दिया कि यह विधेयक संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक सहमति और भारत की विविधतापूर्ण प्रकृति के बारे में बड़े सवाल खड़े करता है।
भाषा संतोष देवेंद्र
देवेंद्र