नयी दिल्ली, 12 अगस्त (भाषा) केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित एक समिति ने उनके सरकारी आवास से नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के मामले में उन्हें दोषी पाया है।
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन-सदस्यीय समिति ने बुधवार को संसद के दोनों सदनों में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायमूर्ति वर्मा पर अधिक मात्रा में नकदी रखने, सबूतों से छेड़छाड़ करने और गोलमोल जवाब देने के आरोप ‘‘साबित’’ हो गए हैं।
यह जांच समिति उस वक्त गठित की गई थी, जब लगभग 200 सांसदों ने संसद द्वारा न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने की मांग की थी।
न्यायमूर्ति वर्मा ने पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन कानून मंत्रालय ने अभी तक उनके इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं की है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सूची में उनका नाम अब भी शामिल है।
इस मामले से अवगत सूत्रों ने बताया कि सरकार शीतकालीन सत्र के दौरान न्यायमूर्ति वर्मा के महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।
न्यायाधीश द्वारा भेजे गए इस्तीफे के बारे में पूछे जाने पर सूत्रों ने कहा कि जब उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश इस्तीफा देता है, तो आमतौर पर उसे मंज़ूर मान लिया जाता है।
हालांकि, न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में, त्याग पत्र संसद में उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही भेजा गया था, इसलिए उनका इस्तीफा अभी तक मंजूर नहीं किया गया है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि सरकार एक मिसाल कायम करना चाहती है और यह संदेश देना चाहती है कि अगर कोई न्यायाधीश गंभीर अनियमितताओं में शामिल होने के बाद इस्तीफा दे भी देता है, तो भी वह पद से हटाए जाने की प्रक्रिया से बच नहीं सकता।
दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के आवास पर 14 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। उस समय न्यायमूर्ति वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे।
आग बुझाने के लिए बुलाए गए दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में अधजली नोटों की गड्डियां मिली थीं।
बिरला ने पिछले साल अगस्त में न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए कई पार्टियों के नोटिस को स्वीकार करने के बाद उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन-सदस्यीय समिति गठित की थी।
दिल्ली में न्यायूमर्ति वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना के बाद, उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेज दिया गया था।
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