नयी दिल्ली, 26 मार्च (भाषा) खुले सुधार गृहों या ‘खुली जेलों’ में महिला कैदियों को नहीं रखे जाने को लेकर विधि आयोग की एक शीर्ष अधिकारी ने बृहस्पतिवार को कहा कि सुधार की राह पर ले जाना कोई रियायत नहीं, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र में सुचारू प्रशासन की एक आवश्यकता है।
तेईसवें विधि आयोग की सदस्य सचिव अंजू राठी राणा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि उच्चतम न्यायालय ने पिछले महीने अपने फैसले में खुले सुधार गृहों के संचालन के संबंध में कई दिशानिर्देश जारी किये थे।
उन्होंने उल्लेख किया कि न्यायालय ने कहा कि महिला कैदियों को खुली जेलों से बाहर नहीं किया जा सकता और इस तरह का निष्कासन – चाहे वह वैधानिक नियमों में निहित हो या प्रशासनिक व्यवहार से उत्पन्न हो – समानता और गरिमा की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है।
पूर्व केंद्रीय विधि सचिव राणा ने कहा, ‘‘महिला कैदियों का सुधार के इस मार्ग तक समान पहुंच सुनिश्चित करना कोई रियायत नहीं, बल्कि एक संवैधानिक लोकतंत्र में सुचारू प्रशासन की आवश्यकता है। सुधार तभी सार्थक होता है जब वह बिना किसी भेदभाव के लागू हो।’’
भाषा सुभाष रंजन
रंजन