नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) तृणमूल कांग्रेस में जारी बगावत का मामला अब निर्वाचन आयोग की चौखट पर पहुंच गया है और दोनों गुटों ने पार्टी के नाम पर अपना-अपना दावा किया है।
तृणमूल कांग्रेस द्वारा हाल ही में अपने पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्यों की नई सूची निर्वाचन आयोग को सौंपे जाने के कुछ दिन बाद बागी विधायक बृहस्पतिवार को यहां आयोग के शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात कर अपने गुट को ‘‘असली’’ तृणमूल के रूप में मान्यता देने की मांग करने वाले हैं।
इस तरह के किसी भी कदम को पहले ही विफल करने की कोशिश में तृणमूल ने निर्वाचन आयोग के समक्ष दावा किया है कि ममता बनर्जी अब भी पार्टी की अध्यक्ष हैं और पार्टी का संगठनात्मक ढांचा सक्रिय है।
हालांकि, निर्वाचन आयोग ने अभी तक दोनों गुटों को बुलाने पर कोई निर्णय नहीं लिया है।
आयोग के एक अधिकारी ने बताया, ‘‘अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है। दोनों गुटों को कोई सूचना नहीं भेजी गई है।’’
निर्वाचन आयोग को टीएमसी का यह पक्ष ऐसे समय में सामने आया है, जब बागी गुट ने कोलकाता में एक विशेष अधिवेशन आयोजित कर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा की और समानांतर संगठनात्मक ढांचे का ऐलान किया। इसे ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को सीधी चुनौती माना जा रहा है।
विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने दावा किया कि यह कदम पार्टी में उत्पन्न ‘‘संवैधानिक संकट’’ के कारण उठाना पड़ा। गुट का कहना है कि फरवरी, 2022 में गठित पिछली राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका है।
हालांकि, ममता बनर्जी गुट ने इस पूरी कवायद को खारिज कर दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने कहा कि बागी नेताओं को इस तरह का अधिवेशन बुलाने या पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करने का कोई अधिकार नहीं है।
तृणमूल का आंतरिक संकट उस समय और गहरा गया, जब सांसदों और विधायकों के एक वर्ग ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
बागी गुट ने दावा किया है कि उसे बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन प्राप्त है जबकि ममता बनर्जी खेमे का कहना है कि असंतुष्टों के पास कोई संगठनात्मक वैधता नहीं है।
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