नयी दिल्ली, दो जुलाई (भाषा) पूर्व सीएपीएफ कर्मियों के एक संगठन ने बृहस्पतिवार को मांग की कि हाल में सीआरपीएफ कैडर के डीआईजी-रैंक के एक अधिकारी के हालिया निलंबन की समीक्षा की जाए। संगठन ने कहा कि उन्हें और कुछ अन्य अधिकारियों को हाल में संसद से पारित सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम का विरोध करने के कारण ‘‘निशाना’’ बनाया जा रहा है।
विभिन्न केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) से सेवानिवृत्त अधिकारियों ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि इस तरह के कदमों से अधिकारियों और उनके परिवारों का मनोबल गिरेगा।
वर्ष 1994 बैच के सीआरपीएफ कैडर के अधिकारी, उप महानिरीक्षक (डीआईजी) बी.सी. पात्रा को हाल ही में निलंबित कर दिया गया। उन पर सीएपीएफ विधेयक पारित होने के दौरान सरकार को ‘‘बदलने’’ के बारे में सोशल मीडिया पर सामग्री साझा करने का आरोप था।
सरकार का कहना है कि यह कानून सीएपीएफ के सभी कर्मियों की सेवा शर्तों को नियंत्रित करने वाला एक समान कानूनी ढांचा बनाता है। इसे संसद ने दो अप्रैल को पारित किया था और यह नौ अप्रैल से लागू हो गया।
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) जैसे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल से सेवानिवृत्त अधिकारियों ने कहा कि वे सरकार विरोधी नहीं हैं, बल्कि अपने अधिकारों और वास्तविक मांगों के लिए न्याय की मांग कर रहे हैं।
सेवानिवृत्त अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) और ‘अलायंस ऑफ ऑल एक्स-पैरामिलिट्री फोर्सेज वेलफेयर एसोसिएशन’ (एएपीब्ल्यूए) के अध्यक्ष एच.आर. सिंह ने कहा ‘‘डीआईजी पात्रा बहुत अच्छे, अनुशासित और विद्वान अधिकारी हैं, और वह ऐसा कोई काम नहीं कर सकते जो कानून के खिलाफ या असंवैधानिक हो। उन्हें निलंबन जैसी कठोर सजा के योग्य नहीं माना जाना चाहिए। किसी अच्छे अधिकारी के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई पूरे बल का मनोबल गिराती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘इस मामले की उचित जांच होनी चाहिए और उनके खिलाफ तभी कार्रवाई की जानी चाहिए जब यह साबित हो कि उन्होंने कोई गलत काम किया है।’’
उन्होंने कहा कि सरकार को सीएपीएफ और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) कैडर के अधिकारियों की सेवा शर्तों के बीच मौजूद ‘‘मुद्दों और अंतर’’ को दूर करना चाहिए।
पात्रा के निलंबन को लेकर सीआरपीएफ के महानिदेशक जी. पी. सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया था कि सीआरपीएफ के सभी सेवारत अधिकारी नियमों, कानूनों और ली गई शपथ से बंधे होते हैं। उन्होंने कहा था, ‘‘इसके खिलाफ़ कोई भी बात-लिखने या बोलने अथवा कोई भी काम करने पर देश के कानून के मुताबिक उचित कार्रवाई की जाएगी।’’
एच आर सिंह ने कहा कि सीआरपीएफ को लगभग 20 अधिकारियों के ‘‘एक साथ’’ तबादले के बारे में भी साफ तौर पर बताना चाहिए, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया था।
सिंह ने कहा कि इन अधिकारियों का आरोप है कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उनकी पत्नियों और परिवारों ने नौ अप्रैल को राजघाट पर सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन किया था।
इस बारे में पूछे जाने पर सीआरपीएफ अधिकारियों ने कहा कि ये तबादले ‘‘प्रशासनिक और परिचालन’’ आवश्यकताओं के आधार पर किए गए थे।
सीएपीएफ कैडर के सेवानिवृत्त और सेवारत दोनों अधिकारियों ने कहा है कि इस अधिनियम के प्रावधान ‘‘दमनकारी’’ और ‘‘भेदभावपूर्ण’’ हैं। उन्होंने कहा है कि यदि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में आईपीएस प्रतिनियुक्तियों को सीमित नहीं किया गया, जैसा कि 2025 में उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी आदेश में निर्देश दिया गया था, तो वे वर्षों तक अपने मौजूदा रैंक पर ही अटके रहेंगे।
बीएसएफ के सेवानिवृत्त उप महानिरीक्षक (आईजी) विकास चंद्र ने कहा कि सीएपीएफ के न तो सेवारत और न ही सेवानिवृत्त अधिकारी सरकार के खिलाफ हैं। बल्कि, पदोन्नति और बेहतर सेवा अवसरों की उनकी आकांक्षाओं की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा, ‘‘सीएपीएफ के कई अधिकारियों की उम्मीद अब निराशा में बदल रही है। उनकी पीड़ा को सरकार को समझना चाहिए।’’
भाषा आशीष अविनाश
अविनाश