प. बंगाल: 58 विधायकों ने तृणमूल से निष्कासित रिताब्रता को विधायक दल का नेता बनाए जाने का समर्थन किया

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प. बंगाल: 58 विधायकों ने तृणमूल से निष्कासित रिताब्रता को विधायक दल का नेता बनाए जाने का समर्थन किया

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  • Publish Date - June 3, 2026 / 02:20 PM IST,
    Updated On - June 3, 2026 / 02:20 PM IST

कोलकाता, तीन जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित विधायक रिताब्रता बनर्जी को विधायक दल का नेता चुना और बुधवार को अपने इस फैसले की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को दे दी। यह कदम सदन में विपक्ष की सत्ता संरचना को पूरी तरह बदल सकता है।

सूत्रों के अनुसार, रिताब्रता, बागी विधायक संदीपन साहा और कई असंतुष्ट विधायक विधानसभा अध्यक्ष से मिले तथा 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र सौंपे।

उन्होंने नयी नेतृत्व टीम का भी प्रस्ताव रखा, जिसमें रिताब्रता को विधायक दल का नेता, जावेद खान, संदीपन साहा और शिउली साहा को उप नेता तथा रघुनाथगंज के विधायक अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक बनाने की बात कही गई।

दलबदल रोधी कानून के तहत किसी अलग गुट को अयोग्यता से बचने के लिए विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। तृणमूल के 80 विधायकों को देखते हुए यह सीमा 54 बनती है।

अगर बागी खेमे का दावा स्वीकार हो जाता है, तो यह उस सीमा को आराम से पार कर लेगा और सदन में अलग गुट के रूप में मान्यता का उसका दावा मजबूत हो जाएगा।

बागी विधायकों ने एक अहम राजनीतिक संकेत देते हुए विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र में तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी को अपनी ‘‘अध्यक्ष’’ बताया है। इससे साफ होता है कि उनकी बगावत पार्टी प्रमुख के खिलाफ नहीं, बल्कि विधायक दल की मौजूदा नेतृत्व संरचना के खिलाफ है।

इस खेमे के सूत्रों ने यह भी बताया कि विधायकों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे विधायक दल के मामलों में अभिषेक बनर्जी के अधिकार को नहीं मानते।

हालांकि, तृणमूल नेतृत्व ने इस पूरी कवायद को विश्वासघात करार दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं विधायक कुणाल घोष ने कहा कि मतभेद संगठन के भीतर बातचीत से सुलझाए जा सकते थे।

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘‘अगर उन्हें कोई शिकायत थी, तो पार्टी के भीतर बात कर सकते थे। इसके बजाय उन्होंने पार्टी की पीठ में छुरा घोंपा।’’

घोष ने बागी विधायकों और उनके समर्थकों को ‘‘गद्दार’’ करार देते हुए कहा कि तृणमूल इस राजनीतिक संकट से उबरेगी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में एकजुट रहेगी।

बुधवार को हुए इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि छह मई को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में तैयार हुई थी।

सूत्रों के अनुसार, उस बैठक में विधायकों ने विपक्ष के नेता, उपनेता और मुख्य सचेतक के पदों के लिए नाम तय करने का अधिकार पार्टी नेतृत्व को सौंप दिया था। अब बुधवार को असंतुष्ट विधायकों के कदम को उसी प्रक्रिया से उपजे असंतोष और अंदरूनी खींचतान के रूप में देखा जा रहा है।

इसके बाद तृणमूल ने विधानसभा को सूचित किया कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय नेता प्रतिपक्ष, नयना बंद्योपाध्याय और अशिमा पात्रा उप नेता तथा फिरहाद हकीम मुख्य सचेतक होंगे। हालांकि, विधानसभा सचिवालय ने प्रक्रियागत कारणों का हवाला देते हुए इस पर संज्ञान नहीं लिया क्योंकि नियमों के अनुसार इन पदाधिकारियों का चुनाव विधायक दल की औपचारिक बैठक में होना जरूरी है।

विवाद उस समय और गहरा गया जब असंतुष्ट विधायकों ने आरोप लगाया कि विधानसभा सचिवालय को भेजे गए पत्र पर उनके हस्ताक्षरों का दुरुपयोग किया गया है। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने इस आरोप को खारिज करते हुए बागी विधायकों पर संगठन को कमजोर करने की कोशिश का आरोप लगाया।

इसी हफ्ते रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद टकराव और तेज हो गया।

अहम बात यह है कि पार्टी नेतृत्व द्वारा निष्कासित रिताब्रता बनर्जी इस बगावत का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं। वहीं, पार्टी के शुरुआती दौर से ममता बनर्जी के विश्वस्त साथी रहे वरिष्ठ नेता जावेद खान के बगावती खेमे में शामिल होने से उनका राजनीतिक कद और बढ़ गया है।

इन घटनाक्रमों ने विधानसभा में विपक्षी राजनीति के नेतृत्व को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, नेता प्रतिपक्ष के पद पर दावा पेश करने के लिए केवल 30 विधायकों का समर्थन पर्याप्त है, लेकिन अब असली लड़ाई विधायक दल की वैधता और उस पर नियंत्रण को लेकर दिखाई दे रही है।

भाषा

खारी नेत्रपाल

नेत्रपाल