भोपाल । मध्य प्रदेश विधानसभा का एक और सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। 15वीं विधानसभा का चुनाव से पहले ये अंतिम सत्र था। जो अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। पूरे सत्र के दौरान विपक्ष ने हंगामे की रणनीति बनाई थी। आदिवासी अत्याचार, सीधी पेशाब कांड, महाकाल लोक घोटाला, सतपुड़ा अग्निकांड सहित कई मुद्दों पर सरकार को घेरा जा रहा था। वहीं सत्ता पक्ष ने भी जवाब देने की तैयारी की थी लेकिन विपक्ष मांगों पर चर्चा के लिए अड़ा रहा। 2 दिनों में भी सदन की कार्यवाही 4 घंटे ठीक से नहीं चली और समय से पहले सत्र स्थगित होने के साथ जनता के मुद्दे हवा हो गए। इसी पर हमारी आज की डिबेट है।
मध्य प्रदेश में साल चुनावी है। सियासत हावी है विधानसभा का मानसून सत्र दो दिन में ही ठंडा कर दिया गया। हंगामे की तपिश का ट्रेलर कल दिखा जरूर और आज भी शोर-शराबे के साथ कुछ मुद्दों की बरसात हुई। सरकार को घेरने की विपक्ष की तैयारी परवान चढ़ पाती। सत्र के दूसरे दिन ही मंशा पर पानी फिर गया। इससे पहले हंगामे के बीच 26 हजार 816 करोड़ का अनुपूरक बजट पारित किया गया। हुक्का बार और तंबाकू से बने उत्पाद के विज्ञापन पर बैन के लिए संशोधित विधेयक पास हुआ। दूसरे दिन विपक्ष ने महाकाल लोक भ्रष्टाचार, आदिवासी अत्याचार, सतपुड़ा भवन की आग के मामले में जांच की मांग को लेकर गर्भ गृह में नारेबाजी की.. हंगामा बढ़ता देख विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम ने सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया। विपक्ष ने सत्ता पक्ष पर चर्चा से भागने और सदन नहीं चलने देने का आरोप लगाया है।
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जनता माननीयों को इसलिए सदन भेजती है कि उनसे जुड़े मुद्दों पर बहस हो। नतीजा निकले कुछ राहत के फैसले हों लेकिन बीते 30 सालों में सदन में घटती बैठकों की संख्या जन और हित के बीच फासले बढ़ा रही है। सत्ता पक्ष इसके लिए विपक्ष के हंगामे को जिम्मेदार बता रहा है। मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में फिलहाल 4 महीनों का वक्त बचा है। कांग्रेस की कोशिश है कि विधानसभा में चर्चा से छूटे तमाम मुद्दों को जनता की अदालत में ले जाया जाए। ताकि सत्ता संग्राम में बीजेपी को घेरा जा सके। जबकि बीजेपी 2 दिन में ही सत्र खत्म हो जाने की जिम्मेदारी कांग्रेस पर डाल रही है। इस जुबानी जंग का नतीजा अब चुनावी जंग के नतीजों के साथ सामने आएगा।