मप्र : मालवी गराड़ू, सैलाना की बालम ककड़ी और मालवी आलू को मिला जीआई तमगा

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मप्र : मालवी गराड़ू, सैलाना की बालम ककड़ी और मालवी आलू को मिला जीआई तमगा

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  • Publish Date - June 22, 2026 / 08:43 PM IST,
    Updated On - June 22, 2026 / 08:43 PM IST

इंदौर, 22 जून (भाषा) पश्चिमी मध्यप्रदेश के मालवा अंचल में खासकर सर्द रातों में चटखारे लेकर खाए जाने वाले गराड़ू कंद, रतलाम जिले के सैलाना की बालम ककड़ी और इंदौर के मालवी आलू की पहचान कानूनी तौर पर भी पुख्ता हो गई है क्योंकि तीनों उत्पादों को उनकी विशिष्ट खूबियों के आधार पर भौगोलिक संकेतक (जीआई) का तमगा प्रदान किया गया है। राज्य सरकार के अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी।

उद्यानिकी विभाग के उप संचालक मंगल सिंह डोडवे ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया,‘‘रतलाम जिले से भेजी गई अर्जियों और आंकड़ों के आधार पर मालवा के गराड़ू कंद और सैलाना की बालम ककड़ी को जीआई तमगा प्रदान किया गया है।’’

उन्होंने बताया कि रतलाम की विशिष्ट जलवायु, मिट्टी और पारंपरिक उद्यानिकी पद्धतियों के कारण जिले में उच्च गुणवत्ता के साथ उगाई जाने वाली बालम ककड़ी और गराड़ू स्वाद के शौकीनों के बीच लंबे समय से मशहूर रहे हैं।

सैलाना की बालम ककड़ी अपने बड़े आकार, रसीले स्वाद और विशिष्ट रंगत के कारण प्रसिद्ध है, जबकि समूचे मालवा अंचल (इंदौर और उज्जैन संभाग) में पैदा होने वाला गराड़ू पकने पर बाहर से कुरकुरा और भीतर से मुलायम रहने की विशेषता के लिए जाना जाता है।

गराड़ू को आमतौर पर तलकर तैयार किया जाता है और इसके बाद उस पर मसाला छिड़ककर और नींबू निचोड़कर परोसा जाता है। सर्दियों के मौसम में इस कंद की मांग अधिक होती है और विवाह समारोहों में यह खासतौर पर परोसा जाता है।

अधिकारियों के मुताबिक रतलाम जिले में फिलहाल बालम ककड़ी का उत्पादन लगभग 100 हेक्टेयर और गराड़ू का उत्पादन करीब 120 हेक्टेयर में किया जा रहा है। इन फसलों की खेती से बड़ी संख्या में किसान जुड़े हैं।

इस बीच, उद्यानिकी विभाग के एक अन्य उप संचालक त्रिलोकचंद्र वास्कले ने बताया कि इंदौर जिले में उगाए जाने वाले मालवी आलू को भी जीआई तमगा प्रदान किया गया है।

वास्कले के मुताबिक इस आलू में शर्करा और माड़ (स्टार्च) की मात्रा अपेक्षाकृत कम होने के कारण इससे बनने वाले चिप्स, वेफर्स और फ्रेंच फ्राइज तलने पर काले या लाल नहीं पड़ते और उनका रंग हल्का बना रहता है।

उन्होंने बताया कि इंदौर जिले में फिलहाल लगभग 45,000 हेक्टेयर में मालवी आलू की खेती की जा रही है और इससे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से करीब 35,000 किसान जुड़े हैं।

वास्कले ने कहा कि मालवी आलू की विशिष्ट गुणवत्ता के कारण कई खाद्य प्रसंस्करण कंपनियां किसानों से सीधे जुड़कर इसकी खरीद करती हैं।

अधिकारियों ने कहा कि जीआई तमगा मिलने से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मालवी गराड़ू, बालम ककड़ी और मालवी आलू की पहचान मजबूत होगी। इसके साथ ही, किसानों को इनका बेहतर मूल्य मिलने, रकबे के विस्तार और निर्यात की संभावनाओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

अधिकारियों के मुताबिक राज्य के अलग-अलग जिलों के कई खाद्य उत्पादों को पहले ही जीआई तमगा मिल चुका है। इनमें रतलामी सेंव, कड़कनाथ चिकन, रियावन लहसुन, चिन्नौर चावल और सुंदरजा आम शामिल हैं।

जीआई तमगा किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति और उससे जुड़ी विशिष्ट गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताओं को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।

भाषा हर्ष धीरज

धीरज