मुंबई, 23 अप्रैल (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने महाराष्ट्र सरकार को उस वकील और पूर्व सैन्य कर्मी को 50-50 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है, जिन्हें पुलिस अमरावती में हथकड़ी पहनाकर राज्य परिवहन की एक बस से थाने से तहसीलदार कार्यालय तक ले गई थी, जहां उन्हें जमानत दे दी गई।
पीठ ने मंगलवार को पारित आदेश में कहा कि दोनों को “अपमानित” किया गया था। उसने कहा कि महाराष्ट्र सरकार के आदर्श वाक्य “सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय” (सज्जनों की रक्षा करना और दुर्जनों का नाश करना) का सम्मान किया जाना चाहिए।
इस आदेश की प्रति बृहस्पतिवार को उपलब्ध कराई गई।
न्यायमूर्ति उर्मिला फाल्के-जोशी और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की पीठ ने कहा कि दोनों आरोपियों को “अपमानित” किया गया, क्योंकि उन्हें अमरावती में राज्य परिवहन की बस में हथकड़ी पहनाकर पुलिस थाने से तहसीलदार कार्यालय तक ले जाया गया, जहां उन्हें जमानत मिल गई।
पीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह वकील योगेश्वर कावड़े और पूर्व सैन्य कर्मी अविनाश दाते को आठ हफ्ते के भीतर 50-50 हजार रुपये का मुआवजा दे।
उसने कहा कि कानून प्रवर्तन में शामिल व्यक्तियों को ध्यान रखना चाहिए कि उनका कर्तव्य केवल आरोपी और पीड़ित के प्रति ही नहीं, बल्कि राज्य और समग्र रूप से समुदाय के प्रति भी है।
पीठ ने कहा, “पुलिस से जुड़ी ऐसी घटनाएं आमतौर पर निजी व्यक्तियों से संबंधित घटनाओं की तुलना में हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में विश्वास को कहीं अधिक कमजोर कर देती हैं।”
उसने कहा कि याचिकाकर्ताओं (कावड़े और दाते) को हथकड़ी लगाने वाले सहायक पुलिस निरीक्षक और दो कांस्टेबल ने उन्हें “अनुचित अपमान और शर्मिंदगी” झेलने के लिए मजबूर किया, इसलिए वे मुआवजे के हकदार हैं।
कावड़े और दाते ने अपनी याचिका में कहा कि वे दाते की कार को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए अगस्त 2010 में अमरावती जिले के तलेगांव पुलिस थाने गए थे।
उन्होंने कहा कि हालांकि, आरोपी ने दोनों के खिलाफ जवाबी मुकदमा दर्ज कराया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने (कावड़े और दाते) उसके साथ मारपीट की और उसे धमकाया।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि पुलिस ने आरोपी की शिकायत के आधार पर आधी रात के बाद उन्हें अवैध रूप से हिरासत में ले लिया और उनके कपड़े उतारकर उन्हें अंतर्वस्त्रों में थाने में बैठाए रखा।
उन्होंने कहा कि अगले दिन पुलिस ने दोनों को हथकड़ी पहनाई और राज्य परिवहन की बस से तहसीलदार कार्यालय ले गई।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, तहसीलदार ने पुलिस को हथकड़ी हटाने का निर्देश दिया और दोनों को जमानत दे दी।
याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ताओं को हथकड़ी लगाने की पुलिस कार्रवाई से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। इसमें दलील दी गई कि यह कदम कानून के खिलाफ है, क्योंकि वे आदतन अपराधी या कुख्यात अपराधी नहीं थे।
अमरावती के पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने अदालत को बताया कि आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच की गई और आवश्यक कार्रवाई की गई।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित को मुआवजा भी दिया जाना चाहिए।
भाषा पारुल पवनेश
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