मुंबई, 30 जून (भाषा) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को कहा कि राज्य सरकार ने अनुसूचित जातियों (एससी) के उप-वर्गीकरण पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है और व्यापक परामर्श के बाद ही कोई कदम उठाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि सरकार इस मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पूरी तरह पालन करेगी।
विधानसभा में फडणवीस ने कहा कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य उन अनुसूचित जाति समुदायों की पहचान करना है, जिन्हें मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के बावजूद पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा एससी आरक्षण के भीतर कोई नया आरक्षण लागू करने का नहीं है, बल्कि उच्चतम न्यायालय के उप-वर्गीकरण संबंधी निर्देशों के अनुरूप विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व की समीक्षा करने का है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि सरकार ने बदर समिति का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह रिपोर्ट राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष रखी गई, जहां यह निर्णय लिया गया कि चूंकि यह मामला समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है, इसलिए सभी हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की जाएं।’’
फडणवीस ने कहा कि सुझाव और आपत्तियां प्राप्त करने तथा सुनवाई करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक समिति बनायी गयी है, जो अपनी सिफारिशें देगी।
उन्होंने कहा कि सरकार ने इस विषय पर अभी तक विधानसभा में कोई विधेयक पेश नहीं किया है।
मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘सरकार का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा और वह निर्णय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का अक्षरश: पालन करते हुए लिया जाएगा।’’
उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी समुदाय के साथ अन्याय करने की मंशा नहीं रखती और यदि कोई अनुसूचित जाति समुदाय पीछे छूटता हुआ पाया गया तो उसके लिए उचित कदम उठाए जाएंगे।
कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) के नेता विजय वडेट्टीवार द्वारा एससी समुदायों के विरोध प्रदर्शन का उल्लेख किए जाने पर फडणवीस ने कहा कि कर्नाटक पहले ही उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुरूप एससी उप-वर्गीकरण लागू कर चुका है।
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन महाराष्ट्र कोई फैसला एकतरफा थोपना नहीं चाहता। राज्य सरकार सभी हितधारकों और विधायकों से चर्चा कर सहमति बनाने के बाद ही अंतिम निर्णय लेना चाहती है।’’
आरक्षण व्यवस्था के संदर्भ में अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण का मतलब है कि एससी की व्यापक श्रेणी को छोटे-छोटे समूहों में बांटा जाए, ताकि आरक्षण और अन्य लाभ सबसे अधिक वंचित और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों तक पहुंच सकें।
उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि राज्य सरकारें अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण कर सकती हैं और आरक्षित श्रेणी के भीतर अलग-अलग कोटा तय कर सकती हैं, लेकिन यह फैसला “मात्रात्मक और प्रमाणित आंकड़ों” के आधार पर होना चाहिए।
भाषा गोला दिलीप
दिलीप