(अपराजिता उपाध्याय)
ग्लास्गो, 26 जुलाई (भाषा) दो बार के ओलंपिक पदक विजेता नीरज चोपड़ा का कहना है कि वह हर प्रतियोगिता में 90 मीटर का आंकड़ा पार करने को लेकर ‘जुनूनी’ नहीं हैं।
नीरज का मानना है कि किसी जादुई नंबर के पीछे भागने के बजाय बड़े खिताब जीतना और मुश्किल हालात में भी लगातार अच्छा प्रदर्शन करना अधिक महत्वपूर्ण है।
पिछले साल दोहा डायमंड लीग में 90.23 मीटर के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ पहली बार 90 मीटर का बहुप्रतीक्षित आंकड़ा पार करने वाले मौजूदा विश्व चैंपियन ने कहा कि किसी भी चैंपियनशिप में उनकी पहली प्राथमिकता स्वर्ण पदक जीतना होती है जबकि थ्रो की दूरी उसके बाद आती है।
नीरज ने ‘पीटीआई’ के एक सवाल के जवाब में नीरज ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे ऐसा कोई दबाव महसूस नहीं होता और ना ही मैं किसी खास दूरी को लेकर जुनूनी हूं। एक खिलाड़ी के रूप में मेरा लक्ष्य हमेशा अपनी दूरी में सुधार करना होता है। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘बड़े टूर्नामेंट में सबसे बड़ी चुनौती दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बीच स्वर्ण पदक जीतना होती है। दूरी दूसरी चीज है। इसलिए मैं अपनी दूरी लगातार बढ़ाने की कोशिश करता हूं। ’’
नीरज 30 जुलाई को ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा के क्वालीफिकेशन दौर में मैदान पर उतरेंगे।
अठाईस वर्षीय नीरज ने माना कि मौसम और अन्य बाहरी परिस्थितियां भाला फेंक प्रतियोगिताओं को काफी प्रभावित करती हैं इसलिए केवल लंबी दूरी नहीं बल्कि निरंतर अच्छा प्रदर्शन भी उतना ही अहम है।
उन्होंने कहा, ‘‘जब परिस्थितियां कठिन होती हैं तो हम मनचाही दूरी हासिल नहीं कर पाते। ऐसे समय में लगातार अच्छा प्रदर्शन करना जरूरी होता है। इसलिए मेरा प्रयास रहता है कि मैं अपनी निरंतरता बनाए रखूं और साथ ही दूरी भी बढ़ाता रहूं। ’’
कई वर्षों की अटकलों के बाद आखिरकार 90 मीटर का आंकड़ा पार कर चुके नीरज ने कहा कि अपने व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में और सुधार करना अब भी उनका दीर्घकालिक लक्ष्य है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं निश्चित रूप से अपने थ्रो में और सुधार करना चाहता हूं। ’’
पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा अब एशिया की सबसे प्रतिस्पर्धी प्रतियोगिताओं में से एक बन चुकी है। पाकिस्तान के ओलंपिक चैंपियन अरशद नदीम, श्रीलंका के डायमंड लीग विजेता रुमेश पथिरागे और नीरज अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार एक-दूसरे को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
नीरज ने कहा, ‘‘यह अच्छी बात है। जब प्रतिस्पर्धा कड़ी होती है तो हम एक-दूसरे को और बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करते हैं। खासकर दक्षिण एशिया में अब काफी मजबूत प्रतिस्पर्धा है और सभी खिलाड़ी खुद को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ’’
नीरज 2018 के गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में अपने पदार्पण पर स्वर्ण पदक जीतने के बाद पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में लौट रहे हैं। चोट के कारण वह 2022 के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा नहीं ले सके थे।
उन्होंने कहा, ‘‘इस बार प्रतियोगिता का स्तर काफी कठिन है। यहां ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप, राष्ट्रमंडल खेल और एशियाई खेलों के पदक विजेता मौजूद हैं। ये सभी खिलाड़ी डायमंड लीग में भी लगातार अच्छा प्रदर्शन करते हैं। ’’
प्रतियोगिता के दौरान बारिश और तेज हवाओं की संभावना को देखते हुए नीरज ने कहा कि उन्होंने इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के लिए पहले से तैयारी शुरू कर दी है और उनका मानना है कि मानसिक मजबूती शारीरिक तैयारी जितनी ही महत्वपूर्ण होगी।
उन्होंने कहा, ‘‘कल मैंने अभ्यास के दौरान कुछ थ्रो किए। परिस्थितियां कठिन हैं, लेकिन सभी खिलाड़ियों के लिए समान हैं। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘चाहे परिस्थितियां कितनी भी खराब हों, हमें मानसिक रूप से मजबूत रहना होगा। मैं हमेशा यही सोचता हूं कि सबसे कठिन हालात में भी अपना सर्वश्रेष्ठ थ्रो कैसे करूं। ’’
अपनी फिटनेस के बारे में नीरज ने कहा, ‘‘अब मैं पूरी तरह फिट हूं। चोट से उबरने के बाद मैंने दोहा में अपनी पहली प्रतियोगिता खेली और वह अच्छी रही। मैंने अपनी कमजोरियों और फिटनेस पर काम किया है और अब मैं पहले से कहीं बेहतर महसूस कर रहा हूं। ’’
ऑस्ट्रेलिया में जीता गया खिताब उनके सीनियर अंतरराष्ट्रीय करियर का पहला स्वर्ण पदक था और वहीं से दुनिया के सबसे बड़े भाला फेंक खिलाड़ियों में शामिल होने का उनका सफर शुरू हुआ।
उन्होंने कहा, ‘‘राष्ट्रमंडल खेलों की मेरी बहुत अच्छी यादें हैं। यह मेरी पहली सीनियर प्रतियोगिता थी और यहीं से मेरे सीनियर करियर की शुरुआत हुई जिसमें मैंने स्वर्ण पदक जीता। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘अब आठ साल बाद मैं फिर यहां लौटा हूं। जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं, जब आप अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं तो बड़ी प्रतियोगिता हमेशा खास होती हैं। ’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं खुश हूं कि मैं फिर मैदान पर हूं। मैं अच्छा महसूस कर रहा हूं और पिछले कुछ समय से अपने खेल पर लगातार काम कर रहा हूं। पिछले आठ वर्षों में इस प्रतियोगिता का स्वरूप काफी बदल गया है। ’’
भाषा नमिता सुधीर
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