इंदौर। अपनी लापरवाहियो के चलते विवादों में घिरे रहने वाले मध्य प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल इंदौर के एमवाय में अब नया घोटाला सामने आया है। यहां नेत्रहीनों के लिए बनाए जाने वाले सर्टिफिकेट्स में बड़ी धांधली सामने आई है। नेत्र विभाग में बैठे बाबू ही बिना जांच किए नेत्रहीनता का प्रमाण-पत्र जारी कर रहे थे। नेत्र विभाग के हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट ने घोटाला उजागर करते हुए इसकी शिकायत डीआईजी को की है। अब पुलिस मामले की जांच करेगी।
एमवाय अस्पताल के नेत्र विभाग में नेत्रहीनों के लिए प्रमाण-पत्र जारी किए जाते हैं। ये प्रमाण-पत्र जारी करने का हक़ सिर्फ कंसल्टेंट डॉक्टर को ही है। लेकिन ये प्रमाण-पत्र बिना कंसल्टेंट डॉक्टर के ही जारी किये जा रहे है। कई प्रमाण-पत्रों में आवेदक के फोटो नहीं हैं तो कई में आवेदक के दस्तखत नहीं हैं।
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यही नहीं, कई आवेदक ऐसे हैं, जो पूरी तरह से देख सकते हैं। उसके बावजूद उनके भी अंधत्व के प्रमाण-पत्र बना दिए गए। तीन महीने पहले ही नेत्र विभाग में विभागाध्यक्ष के तौर पर डॉक्टर संजीव अग्रवाल ने ज्वाइन किया है। अपने विभाग की जांच करते हुए उन्होंने यह पाया है।
इस घोटाले के सामने आने के बाद डॉक्टर संजीव अग्रवाल इसकी शिकायत मयसबूत डीआईजी हरिनारायण चारी मिश्र को करने पहुंचे। शिकायत में डॉ अग्रवाल ने बताया है कि 500 से अधिक फर्जी ब्लाइंड सर्टीफिकेट जारी हो चुके हैं। जाली सर्टीफिकेट की कॉपी डीआईजी को दिखाते हुए उन्होने कहा कि ये गोरखधंधा सालों से चल रहा है और सर्टीफिकेट बनाने के काम जिम्मा नेत्र रोग विभाग के बाबू शैलेन्द्र बजाज के पास है। इस गंभीर मामले की शिकायत के बाद डीआईजी मिश्र ने सीएसपी कोतवाली को मामले की जांच का जिम्मा सौंपा है। डीआईजी का कहना है कि वे मामले की जांच करा रहे हैं और जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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ब्लाइंड सर्टीफिकेट बनवाने का पीछे लोगों का मकसद सरकार की योजनाओं का लाभ लेना होता है। ब्लाइंड व्यक्ति और उसके सहयोगी को ट्रेन में फ्री यात्रा के साथ ही पेंशन, नौकरी में आरक्षण समेत सरकार की तमाम योजनाओं का लाभ तो मिलता ही है, साथ उन्हें इनकम टैक्स के दायरे से भी बाहर रखा गया है। यही कारण है कि लोग ब्लाइंड सर्टीफिकेट हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने का तैयार रहते है और इस तरह के फर्जीवाड़े सामने आते हैं।
वेब डेस्क, IBC24