लोक अदालत और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को तलाक देने का अधिकार नहीं: उच्च न्यायालय

लोक अदालत और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को तलाक देने का अधिकार नहीं: उच्च न्यायालय

लोक अदालत और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को तलाक देने का अधिकार नहीं: उच्च न्यायालय
Modified Date: May 31, 2026 / 11:10 pm IST
Published Date: May 31, 2026 11:10 pm IST

लखनऊ, 31 मई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक अहम निर्णय में कहा कि तलाक के मामलों पर फैसला देना लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

पीठ ने कहा कि शादी को खत्म करने का अधिकार पूरी तरह से कुटुम्ब अदालत के पास है और लोक अदालतें सिर्फ सम्बन्धित पक्षों के बीच समझौता कराने तक ही सीमित हैं, वे कोई न्यायिक फैसला नहीं दे सकतीं।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सर्राफ और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने 30 अप्रैल को एक महिला द्वारा दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया।

महिला ने याचिका में साल 2018 में उन्नाव स्थित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके पति ने प्राधिकरण द्वारा दर्ज किए गए समझौते को तलाक का आदेश मानते हुए उसे दूसरी शादी करने के लिए आधार बनाया था।

अदालत ने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009 के तहत तलाक से जुड़े वैवाहिक मुकदमों को फैसले के लिए लोक अदालतों में नहीं भेजा जा सकता।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि लोक अदालत की भूमिका सिर्फ पक्षों के बीच आपसी समझौता कराने तक ही सीमित है और वह ऐसे वादों पर न्यायिक फैसला नहीं दे सकती।

पीठ ने उन्नाव के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा की गई कार्यवाही पर चिंता जताते हुए कहा कि जब कानून खुद ही लोक अदालतों को तलाक देने से रोकता है, तो ऐसे आदेश पारित करना अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन माना जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि समझौते में शामिल शर्त दरअसल कानूनी रूप से मान्य नहीं है और उसे रद्द माना जाएगा।

शर्त के तहत दोनों पक्ष दूसरी शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं, ऐसा जिक्र किया गया था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में किसी भी सक्षम अदालत द्वारा तलाक का कोई भी वैध आदेश कभी पारित नहीं किया गया लिहाजा पति द्वारा तलाक के सबूत के तौर पर उस समझौते पर भरोसा करना कानून की नजर में मान्य नहीं हो सकता।

अदालत ने याचिका का निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उचित कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी।

पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि इस फैसले की एक प्रति पूरे राज्य की सभी लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भविष्य के मार्गदर्शन और अनुपालन के लिए भेजी जाए।

भाषा सं. सलीम जितेंद्र

जितेंद्र


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