अलीगढ़ (उप्र), 20 मई (भाषा) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की अंतःविषय जैव प्रौद्योगिकी इकाई के शोधकर्ताओं ने अलीगढ़ शहर से बहने वाले अपशिष्ट जल में एक नए मल्टीड्रग-प्रतिरोधी जीवाणु जीनोम की पहचान की है, जिससे घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बढ़ते खतरे को लेकर चिंता बढ़ गई है।
विज्ञान पत्रिका ‘मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिपोर्ट्स’ के अप्रैल संस्करण में प्रकाशित निष्कर्ष, असद उल्लाह खान, शम्सी खालिद और अबसार तलत के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम के दीर्घकालिक अध्ययन पर आधारित हैं, जो एक दशक से अधिक समय से एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन (एआरजी) के विकास पर नज़र रख रहे हैं।
अध्ययन के अनुसार, एक प्रमुख शहर के नाले से ‘एके 633’ के रूप में पहचाने गए बैक्टीरियल आइसोलेट के जीनोम अनुक्रमण से एनडीएम -7 जीन ले जाने वाले एक दुर्लभ ‘मोज़ेक प्लास्मिड’ की उपस्थिति का पता चला, जो कई एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोध से जुड़ा हुआ है।
सूक्ष्म जीव विज्ञान में, ‘प्लास्मिड’ बैक्टीरिया के अंदर छोटे डीएनए अणु होते हैं जो दवा-प्रतिरोध गुणों सहित आनुवंशिक सामग्री को एक जीवाणु से दूसरे जीवाणु में स्थानांतरित कर सकते हैं। ‘मोज़ेक प्लास्मिड’ आनुवंशिक पुनर्संयोजन के माध्यम से बने ‘प्लास्मिड’ को संदर्भित करता है, जो इसे विभिन्न जीवाणु स्रोतों से प्रतिरोध लक्षण ले जाने में सक्षम बनाता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि एनडीएम-7 जीन नयी दिल्ली मेटालो-बीटा-लैक्टामेज़ (एनडीएम) प्रतिरोध जीन के परिवार से संबंधित है, जो बैक्टीरिया को कार्बापेनम जैसे ‘अंतिम उपाय वाले एंटीबायोटिक्स’ के लिए भी प्रतिरोधी बनाता है, जिनका उपयोग अक्सर अन्य एंटीबायोटिक्स के विफल होने पर किया जाता है।
अध्ययन में कहा गया है कि एके 633 की अनुक्रमणिका ने उच्च जोखिम वाले एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीवाणु क्लोनों के संभावित वैश्विक प्रसार में प्लास्मिड ‘पी1550’ की भूमिका की ओर इशारा किया।
‘पीटीआई-भाषा’ से बात करते हुए, शोधकर्ता असद उल्लाह खान ने कहा कि निष्कर्ष दवा प्रतिरोधी जीवाणु जीनोम के बढ़ते खतरे की निगरानी और रोकथाम के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय निगरानी और जागरूकता कार्यक्रम की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध दुनिया भर में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभरा है और उन्होंने अनुपचारित अपशिष्ट निपटान, विशेष रूप से अस्पताल अपशिष्ट, और खराब जल निकासी प्रबंधन को महत्वपूर्ण योगदान कारकों के रूप में बताया।
खान ने शहरी क्षेत्रों में नाली-सफाई कार्यों के दौरान सतर्कता की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा, ‘अक्सर नालियों की सफाई के बाद कीचड़ को तुरंत हटाने के बजाय लंबे समय तक सड़क के किनारे छोड़ दिया जाता है। ऐसी प्रथाएं प्रतिरोधी जीवों के प्रसार में योगदान कर सकती हैं।’
शोधकर्ताओं के अनुसार, जीनोटाइपिक विश्लेषण – ‘बैक्टीरिया आइसोलेट्स’ की आनुवंशिक संरचना का अध्ययन – यह समझने के लिए आवश्यक है कि प्रतिरोधी जीन समुदाय और अस्पताल सेटिंग्स में बैक्टीरिया के बीच कैसे फैलते हैं।
खान ने कहा कि अब तक वैश्विक स्तर पर एनडीएम जीन के कम से कम 94 प्रकारों की पहचान की गई है, जिनमें से कई अस्पतालों और समुदाय दोनों में तेजी से पाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘ये अंतिम उपाय वाले एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध के मुख्य कारणों में से हैं।’
शोधकर्ताओं ने गौर किया कि हालांकि इसी तरह का काम भारत में सीमित संख्या में प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है, लेकिन मल्टीड्रग-प्रतिरोधी जीवाणु जीनोम द्वारा बढ़ते खतरे से निपटने के लिए एक बड़े वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयास की आवश्यकता है।
भाषा सं जफर मनीषा दिलीप
दिलीप