(एना रेमेकर, जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी)
जॉर्जिया, 14 मार्च (द कन्वरसेशन) ईरान में जारी युद्ध के कारण हवाई हमलों और बढ़ती सैन्य गतिविधियों की खबरें सुर्खियों में रही हैं लेकिन युद्ध में तत्काल तबाही के अलावा, इस संघर्ष ने तेजी से बढ़ते एक और खतरे को भी उजागर किया है और वह है- पोतों की नेविगेशन प्रणाालियों में व्यवधान के कारण जहाजों और इन्हें संचालित करने वाले लोगों पर खतरा।
आधुनिक जहाजरानी व्यवस्था जीपीएस उपग्रह नेविगेशन पर काफी हद तक निर्भर करती है। जब इन संकेतों में बाधा उत्पन्न होती है या उनमें हेरफेर किया जाता है, तो जहाज अपने नाविकों और अन्य जहाजों को अचानक किसी अन्य स्थान पर दिखाई दे सकते हैं, जबकि वास्तव में वे कहीं और होते हैं।
महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे और समुद्री प्रणालियों का अध्ययन करने वाली एक साइबर सुरक्षा शोधकर्ता के रूप में, मैं इस बात की समीक्षा करती हूं कि डिजिटल खतरे जहाजों और उन्हें संचालित करने वाले लोगों को कैसे प्रभावित करते हैं।
जीपीएस व्यवधानों से उत्पन्न खतरे को समझने के लिए, पहले यह समझना आवश्यक है कि जीपीएस कैसे काम करता है। जीपीएस प्रणाली पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे उपग्रहों से प्राप्त संकेतों का उपयोग करके स्थान का निर्धारण करती है।
जीपीएस जैमिंग में, हमलावर विद्युत चुम्बकीय शोर से उपग्रह के वास्तविक संकेतों को अवरुद्ध कर देता है, जिससे उनकी पहचान नहीं हो पाती। ऐसा होने पर नेविगेशन प्रणाली में गड़बड़ी आ जाती है। फोन पर, ऐसा लग सकता है कि नक्शा रुक गया है या अनियमित रूप से हिल रहा है।
समुद्र में नाविकों के लिए, जीपीएस में गड़बड़ी के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। खुले समुद्र में, अगर जीपीएस ठीक से काम नहीं करता है, तो जहाज की स्थिति की पुष्टि करने के लिए बहुत कम स्थलचिह्न होते हैं।
इसका एक उदाहरण मई 2025 में सामने आया। लाल सागर से गुजरते समय, कंटेनर जहाज एमएससी एंटोनिया अपनी वास्तविक स्थिति से काफी दूर की स्थिति दिखाने लगा। इससे चालक दल भ्रमित हो गया और अंततः जहाज किनारे से टकरा गया।
जहाज के फंसने से लाखों डॉलर का नुकसान हुआ और बचाव अभियान पांच सप्ताह से अधिक समय तक चला।
एमएससी एंटोनिया जैसी घटना कोई एक घटना नहीं हैं। पोत-ट्रैकिंग डेटा से पता चला है कि जहाजों के समूह अचानक दूरस्थ स्थानों पर नजर आते हैं।
ये विसंगतियां भू-राजनीतिक संघर्ष से ग्रस्त क्षेत्रों में जीपीएस ‘स्पूफिंग’ से जुड़ी हुई हैं।
‘स्पूफिंग’ एक साइबर हमला है जिसमें अपराधी अपनी पहचान छिपाकर किसी विश्वसनीय व्यक्ति का रूप धारण करते हैं।
जीपीएस में हस्तक्षेप जहाजों को प्रभावित करने वाले साइबर खतरों का केवल एक प्रकार है। जैसे-जैसे जहाज उपग्रह इंटरनेट प्रणाली और दूरस्थ निगरानी उपकरण के माध्यम से अधिक जुड़ते जा रहे हैं, साइबर हमलों की आशंका बढ़ती जा रही है।
समुद्री साइबर सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक चर्चा अधिकतर जहाज प्रणालियों में तकनीकी खामियों पर केंद्रित है लेकिन इस पहेली का एक उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा वे लोग हैं जिन्हें इन तकनीकों के गलत होने पर उनका विवरण देना होता है और प्रतिक्रिया देनी होती है।
हाल में किए गए एक शोध में, मैंने और मेरे सहयोगियों ने पेशेवर नाविकों का साक्षात्कार लिया ताकि साइबर घटनाओं से जुड़े उनके अनुभवों और उनसे निपटने की उनकी तैयारियों के बारे में जाना जा सके।
जिन लोगों का साक्षात्कार लिया गया उनमें नौवहन अधिकारी, इंजीनियर और जहाज प्रणालियों के लिए जिम्मेदार अन्य चालक दल के सदस्य शामिल थे। इनसे एक ही बात स्पष्ट हुई और वह यह है कि समुद्र में साइबर खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन चालक दल उनसे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं।
(द कन्वरसेशन)
देवेंद्र सिम्मी
सिम्मी