क्यों कुछ लोग भूख लगने पर अधिक उग्र हो जाते हैं?

क्यों कुछ लोग भूख लगने पर अधिक उग्र हो जाते हैं?

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  • Publish Date - January 17, 2026 / 05:45 PM IST,
    Updated On - January 17, 2026 / 05:45 PM IST

(नील्स क्रोमर, चिकित्सा मनोविज्ञान के प्रोफेसर, ट्यूबिंजन विश्वविद्यालय; बॉन विश्वविद्यालय)

लंदन, 17 जनवरी (द कन्वरसेशन) मैंने अपने बेटे से कहा, ‘‘चलो, अब हमें चलना चाहिए।’’ लेकिन मेरा बेटा मेरी बात नहीं सुन रहा था। खेल के मैदान की रेत भुरभुरी थी और इसलिए वह अपने नए खिलौने वाले एक्सकेवेटर से उसे खोद रहा था।

इसके बाद मैं अपने दैनिक काम निपटाने लगी तभी उसकी खिलखिलाहट अचानक सिसकियों में बदल गई। मेरे बेटे को चोट नहीं लगी थी, बस वह बहुत परेशान था। जब मैंने अपना फोन देखा, तो पता चला कि उसके खाने का समय काफी पहले ही बीत चुका था और उसे बहुत भूख लग रही थी।

हम चाहे कितने भी बड़े हो जाएं, शरीर को पर्याप्त भोजन न मिलने पर हम सभी चिड़चिड़े हो जाते हैं। मनुष्य हमेशा से इस अनुभव का सामना कर रहा है, लेकिन इस घटना को परिभाषित करने वाला विशिष्ट शब्द ‘हैंग्री’ ऑक्सफोर्ड के अंग्रेजी शब्दकोष में 2018 में ही शामिल हुआ। इस शब्द का अभिप्राय है भूख के कारण चिड़चिड़ा या बदमिजाज होना। शायद इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि भूख लोगों के रोजमर्रा की मनोदशा को कैसे प्रभावित करती है, इस पर शोध की कमी है।

भोजन और मनोदशा पर किए गए अधिकांश अध्ययनों में चयापचय संबंधी या खाने के विकारों से पीड़ित रोगियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। शायद इसलिए कि कई मनोवैज्ञानिकों ने परंपरागत रूप से भूख को एक बुनियादी शारीरिक प्रक्रिया के रूप में समझा है।

इसलिए, मनोविज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़े अपने सहयोगियों के साथ मिलकर, मैंने यह पता लगाने का फैसला किया कि भूख लगने पर अलग-अलग लोग कैसी प्रतिक्रिया करते हैं। हम यह देखना चाहते थे कि क्या (और क्यों) कुछ लोग भूख लगने पर भी संयमित रहते हैं। शायद इससे छोटे बच्चों वाले माता-पिता को भी कुछ सीखने को मिले।

आश्चर्यजनक नतीजे

पशु जगत में, अक्सर भूख को एक प्रमुख प्रेरक के रूप में इसकी भूमिका के लिए अध्ययन किया जाता है। उदाहरण के लिए, भूखे चूहे भोजन प्राप्त करने के लिए किसी वस्तु को पूरी ताकत से खोलने की कोशिश करते हैं या बड़ी दीवारों पर चढ़ जाते हैं।

जंगल में, भूखे जानवर अक्सर अपने वातावरण का पता लगाने के लिए और दूर तक घूमते हैं, और कम या बिल्कुल भी ऊर्जा न होने के खतरे से उबरने की कोशिश में बेचैन दिखाई देते हैं।

लोगों में ऊर्जा स्तर, भूख और मनोदशा के बीच संबंध का पता लगाने के लिए, हमने 90 स्वस्थ वयस्कों के शरीर में ग्लूकोज के स्तर की पूरे एक महीने तक निगरानी की।

ग्लूकोज शरीर और मस्तिष्क के लिए ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है, और इसके स्तर की निगरानी नैदानिक ​​अभ्यास में मधुमेह रोगियों को उनके रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करने के लिए करते हैं। हर कुछ मिनटों में परिमाण रिपोर्ट करते हैं। (प्रतिभागी सेंसर ऐप का उपयोग करके सक्रिय रूप से अपने ग्लूकोज स्तर की जांच कर सकते थे, और हम देख सकते थे कि उन्होंने कब इसकी जांच की।)

हमने अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों से दिन में दो बार तक अपने स्मार्टफोन पर मनोदशा की स्थिति दर्ज करने के लिए कहा। इसमें शून्य से 100 के पैमाने पर यह पूछना शामिल था कि उन्हें कितनी भूख लग रही है या वे कितने संतुष्ट महसूस कर रहे हैं, साथ ही उनकी वर्तमान मनोदशा का मूल्यांकन भी करना था।

परिणामों ने हमें चौंका दिया। पहला, लोगों की मनोदशा केवल तभी खराब हुई, जब उन्होंने भूख लगने की बात स्वीकार की– न कि केवल तब जब उनके रक्त शर्करा का स्तर कम था और दूसरा, जो लोग आम तौर पर अपने ऊर्जा स्तर का अधिक सटीक आकलन कर पाते थे, उनमें नकारात्मक मनोदशा के लक्षण कम दिखाई देते थे।

इससे ज्ञात होता है कि किसी व्यक्ति की ऊर्जा और मनोदशा के स्तर के बीच एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक मध्यवर्ती चरण होता है, जिसे वैज्ञानिक अंतर्संवेदन कहते हैं।

मस्तिष्क में, भूख का संकेत ‘हाइपोथैलेमस’ में स्थित न्यूरॉन्स द्वारा मिलता है, जो लंबे समय तक ऊर्जा की कमी का पता लगाते हैं। भूख की सचेत भावनाएं फिर इंसुला से जुड़ी होती हैं, जो मस्तिष्क के भीतर गहराई में स्थित सेरेब्रल कॉर्टेक्स का एक हिस्सा है, और जो स्वाद को भी संसाधित करता है और भावनाओं को महसूस करने में भूमिका निभाता है।

हमारे हालिया अध्ययन में, उच्च अंतर्बोध सटीकता वाले लोगों में मनोदशा में उतार-चढ़ाव कम देखा गया। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि उन्हें कभी भूख नहीं लगी, बल्कि वे अपनी मनोदशा को स्थिर रखने में अधिक सक्षम प्रतीत हुए।

यह अहम है, क्योंकि मनोदशा में अचानक बदलाव का असर परिवार, दोस्तों और सहकर्मियों के साथ संबंधों पर पड़ सकता है। इससे गलत निर्णय लेने और आवेगपूर्ण व्यवहार करने की आशंका बढ़ सकती है, जिसमें ऐसे ऊर्जावर्धक खाद्य पदार्थों की खरीदारी भी शामिल है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।

आमतौर पर शरीर की जरूरतों पर ध्यान देने से हमारा मन भी शांत रहता है और शरीर और मन दोनों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता। शरीर की आदर्श स्थिति से बहुत अधिक विचलन हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक खतरा पैदा कर सकता है।

ये नियंत्रण खो सकते

छोटे बच्चों को अपने तेजी से विकसित हो रहे शरीर से मिलने वाले सभी संकेतों को समझना मुश्किल लगता है। वे अपने आसपास की चीजों से आसानी से विचलित हो जाते हैं और अक्सर बिना किसी संकेत के अपनी भूख या प्यास पर ध्यान नहीं देते। इससे अचानक वे आक्रोशित हो जाते हैं जैसा कि मेरे बेटे के साथ खेल के मैदान में हुआ था।

इसी प्रकार आज की तेज रफ्तार और डिजिटल दुनिया में कई तरह के व्यवधानों के कारण कई वयस्कों में ऊर्जा का स्तर अचानक कम हो जाना आम बात है। इसका एक आसान उपाय है, नियमित रूप से भोजन करना, क्योंकि अक्सर भोजन छोड़ देने पर ही भूख लगती है।

हर किसी के ऊर्जा स्तर में उतार-चढ़ाव होता रहता है, यह तो स्वाभाविक है, लेकिन अपने आंतरिक तंत्र को अपने ऊर्जा स्तरों पर अधिक ध्यान देने की अनुमति देकर अपनी स्थिति को बेहतर बना सकते हैं। इसके अलावा, व्यायाम और शारीरिक गतिविधि भूख को महसूस करने की क्षमता को बढ़ा सकते हैं और ऊर्जा चयापचय को बेहतर कर सकते हैं।

अधिकांश समय अन्य कारकों के अलावा भूख का हमारे मनोदशा पर केवल मामूली प्रभाव पड़ता है, लेकिन खेल के मैदान में बिताए समय से मुझे एक सबक यह मिला है कि अपने बेटे की खाने-पीने की जरूरतों का ध्यान तब रखना चाहिए, जब वे स्पष्ट रूप से दिखाई देने से पहले ही हों। शायद हम सभी को भूख लगने पर चिड़चिड़ापन होने के खतरे के प्रति अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है।

(द कन्वरसेशन)

धीरज सुरेश

सुरेश