प्रतिक्रिया के तेवर से व्यक्ति के मानसिक मिजाज का संकेत मिल जाता है। रायपुर के एक ATM से रुपए नहीं निकलने पर मेरे मोदी समर्थक सहकर्मी मित्र ने जिस तेवर में प्रतिक्रिया जाहिर की,उससे मोदी समर्थकों के मानसिक मिजाज में आ रही तब्दीली के संकेत छिपे हैं। मैंने समझाया भी कि भाई! दस कदम पर दूसरा ATM है, चल उसमें ट्राई करते हैं। उसने झल्लाहट के साथ इस स्थिति के लिए सारा ठीकरा मोदी पर फोड़ा और बजाए दूसरे ATM में जाने के मोदी को लानत भेजता घर चला गया। मैं हैरान था कि नोटबंदी के दौरान पैदा हुई कैश की किल्लत को भविष्य की बेहतरी के लिए वर्तमान का मामूली संकट बताकर इस ATM से उस ATM भटकने वाला मेरा वही मित्र आज महज दस कदम पर मौजूद दूसरे ATM जाने की जहमत नहीं उठा सका। फिर मुझे भान हुआ कि कई दूसरे मोदी समर्थक मित्र और परिचित भी तो इन दिनों प्रधानमंत्री मोदी को लेकर किंतु-परंतु और ऐसा-वैसा की टेक के साथ बात करने लगे हैं। मोदी के पक्ष में बोले जाने वाले प्रशंसा के स्वर में अब उलाहना का पुट नजर आने लगा है।सवाल उठता है कि मानसिक मिजाज में आई ये तब्दीली कहीं मोदी से मोहभंग होने की शुरुआत तो नहीं है? मोदी के प्रति भक्तिभाव में आई आंशिक गिरावट के पीछे दरअसल कई फुटकर वजहें जिम्मेदार हैं। सबसे पहले बात मोदी के सवर्ण समर्थक वर्ग के नाराजगी की।
SC-ST एक्ट की विसंगति को दुरुस्त करने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ सरकार के रुख ने मोदी के सवर्ण समर्थकों को मायूस कर दिया है। ऊपर से दलित वर्ग को आश्वस्त करने के फेर में अध्यादेश लाने का ऐलान करके मोदी ने सवर्ण मतदाताओं को खिसिया अलग दिया है। मोदी का ये सवर्ण समर्थक वर्ग समझ नहीं पा रहा है कि नेशन फर्स्ट के लुभावने सूत्र वाक्य के साथ जातिवाद के खिलाफ बातें करने वाला उनका नायक भी जातिगत समीकरणों को साधने के चक्कर में उसी दलदल में आखिर क्यों उतर गया? मोदी का सवर्ण समर्थक वर्ग ये भी नहीं समझ पा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के तर्कसंगत फैसले को पलटने के लिए अध्यादेश लाने का ऐलान करने वाले नरेंद्र मोदी और शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के जरिए पलटने वाले राजीव गांधी में फिर क्या सैद्धांतिक अंतर क्या ? राजीव मुस्लिम तुष्टिकरण में उलझ गए तो नरेंद्र मोदी दलित तुष्टिकरण में। कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण ने उसे हिंदुओं से दूर कर दिया, देखिए कहीं भाजपा का दलित तुष्टिकरण उसे सवर्णों से ना बिचका दे।
अब बात उस समर्थक वर्ग के नाराजगी की जो मोदी की तानाशाह छवि और विरोधियों को सबक सिखाने वाले अंदाज का कायल था। ये वर्ग उम्मीद लगाए बैठा था कि एक बार मोदी को प्रधानमंत्री बनने दो, फिर देखना राष्ट्रविरोधियों पर कैसी शामत आती है। लेकिन चार साल बीतने को आए, मोदी ऐसा प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे हैं। मोदी का ये कट्टर समर्थक वर्ग जब ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह’ नारे लगाने वाले गैंग के कन्हैया और उमर खालिद जैसे सरगनाओं को देश के खिलाफ आग उगलते देखता है तो खून के आंसू पीकर रह जाता है। कुछ बिगाड़ नहीं पाने से उपजी खीज तब और भड़क जाती है जब वे हार्दिक पटेल जैसे वोटों के सुपारीबाजों को नेता के रूप में स्थापित होते देखते रह जाते हैं। समान नागरिक संहिता, धारा 370 और राम मंदिर- वो तीन भावनात्मक मुद्दे हैं जिन्होंने राष्ट्रवादियों को भाजपा के साथ दिल से जोड़ रखा है। और सच पूछा जाए तो मोदी को पूर्ण बहुमत से सत्ता सौंपने के पीछे इन मुद्दों को साकार करने की आकांक्षा भी एक बड़ी वजह थी। लेकिन अब जबकि मोदी के कार्यकाल को एक साल ही बाकी रह गया है, इन तीनों मुद्दों पर कुछ ठोस नहीं होता देखकर भाजपा के परंपरागत मतदाताओं में बेचैनी बढ़ना लाजमी है।
ऐसे में सवाल उठता है कि मोहभंगता की कगार पर पहुंच चुकी मोदी समर्थकों की ये अकुलाहट कहीं मोदी की दूसरी पारी की राह में रोड़ा तो नहीं बन जाएगी? इसके बावजूद अगर भाजपा ये मुगालता पाले है कि विकल्पहीनता की मजबूरी के चलते उसका समर्थक वर्ग मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए झक मारकर भाजपा को ही वोट देगा तो उसे उसकी ये खुशफहमी मुबारक।खतरा ये है कि नाराज मतदाता कहीं फूफा बनकर मतदान केंद्र में जाने की बजाए मुंह फुलाकर घर में ही ना बैठा रह जाए। और अगर ये फूफा मतदान केंद्र गया भी तो कहीं नोटा पर बटन दबा कर ना आ जाए। ये आशंका नाहक नहीं है। गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा इसी नोटा का खामियाजा उठाकर दहाई अंक में पहुंच भी चुकी है। गुजरात में कुल मतदाताओं में से 1.8 फीसदी लोगों ने नोटा पर वोट देकर भाजपा को तगड़ा झटका दिया था। इतने फीसदी वोट तो आप और बसपा जैसी को भी नहीं मिले थे। गोधरा समेत कुछ सीटों पर तो नोटा वोटों की संख्या हार-जीत के अंतर से भी ज्यादा थी।कुुल मिलाकर मोदी की दूसरी पारी की संभावना अब इस बात से तय होनी है कि वो फूफाओं को रूठने से रोकने के लिए क्या जतन करते हैं।
सौरभ तिवारी,
असिस्टेंट एडिटर, IBC24