बाजार रुझानों के साथ कदमताल कर रहा है प्रतिस्पर्धा आयोग : कैग मूर्ति

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बाजार रुझानों के साथ कदमताल कर रहा है प्रतिस्पर्धा आयोग : कैग मूर्ति

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  • Publish Date - May 20, 2026 / 03:15 PM IST,
    Updated On - May 20, 2026 / 03:15 PM IST

नयी दिल्ली, 20 मई (भाषा) भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के. संजय मूर्ति ने बुधवार को कहा कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) बाजार के रुझानों के साथ तालमेल बनाए हुए है। साथ ही ‘‘प्रभाव-आधारित’’ दृष्टिकोण की ओर बढ़ते हुए नियामक केवल बाजार हिस्सेदारी पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी ध्यान दे रहा है कि डिजिटल आचरण नवाचार एवं उपभोक्ता पसंद को कैसे प्रभावित करता है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में उत्पादन के पैमाने से नहीं, बल्कि डेटा के पैमाने, परिवेश तंत्र पर नियंत्रण और पहुंच पर प्रभाव के माध्यम से ही वर्चस्व हासिल किया जा सकता है।

राष्ट्रीय राजधानी में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के 17वें वार्षिक दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए मूर्ति ने कहा कि प्रतिस्पर्धा के अभाव में आत्मसंतोष को बढ़ावा मिलता है, अक्षमता जड़ जमा लेती है और अंततः उपभोक्ता (चाहे वह एक परिवार हो या स्वयं भारत सरकार) कम के लिए अधिक भुगतान करता है।

उन्होंने कहा, ‘‘ पिछले कुछ वर्षों में, डिजिटल बाजारों के विकास के बाद से, सीसीआई ने बाजार रुझानों के साथ कदम मिलाते हुए बड़ी कंपनियों पर भी ध्यान केंद्रित किया है, ई-कॉमर्स मंच की जांच की है और दबदबे की स्थिति के दुरुपयोग के लिए मंचों को दंडित किया है…’’

सीसीआई बाजार में विभिन्न क्षेत्रों में अनुचित व्यावसायिक व्यवहार पर नजर रखता है और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है।

मूर्ति ने कहा, ‘‘प्रभाव-आधारित दृष्टिकोण की ओर रुख करते हुए सीसीआई अब केवल बाजार हिस्सेदारी के बजाय इस बात पर ध्यान दे रहा है कि डिजिटल आचरण नवाचार और उपभोक्ता विकल्प को कैसे प्रभावित करता है। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘ सरकारी खरीद में जब आपूर्तिकर्ता कीमत तय करने, बोली में हेरफेर करने या बाजार बिगाड़ने के लिए मिलीभगत करते हैं, तो वे केवल प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन नहीं करते बल्कि सार्वजनिक कोष को प्रत्यक्ष और मापनीय नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए कैग द्वारा खरीद का ऑडिट प्रतिस्पर्धा प्रवर्तन के समानांतर गतिविधि नहीं है बल्कि यह एक पूरक साधन है, जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संस्थागत दबाव उत्पन्न करता है कि भारत का विशाल सरकारी बाजार वास्तव में प्रतिस्पर्धी बना रहे।’’

भाषा निहारिका अजय

अजय