(EPFO Pension / Image Credit: ANI News)
EPFO Pension: प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए प्रोविडेंड फंड यानी PF भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा साधन होता है। हर महीने की सैलरी से कटने वाली राशि सिर्फ बचत नहीं होती बल्कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन की उम्मीद भी इसी से जुड़ी होती है। आज के समय में लोग अच्छे करियर के लिए जल्दी-जल्दी नौकरी बदलते रहते हैं, ऐसे में कई बार PF से पैसा निकालना पड़ जाता है। लेकिन इस फैसले का सीधा प्रभाव आपकी पेंशन पर पड़ सकता है।
अकसर लोग PF और पेंशन को एक ही मान लेते हैं, जबकि दोनों अलग होता है। कर्मचारी की सैलरी से कटने वाली पूरी रकम EPF में जाती है। वहीं, नियोक्ता का योगदान दो हिस्सों में बंट जाता है, एक हिस्सा EPF में और दूसरा हिस्सा कर्मचारी पेंशन स्कीम यानी EPS में जमा होता है। EPS में जमा पैसा ही आगे चलकर आपकी मासिक पेंशन का आधार बनता है।
EPFO के नियमों के मुताबिक, किसी भी कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 साल की नौकरी पूरी करनी जरूरी है। यह अवधि एक कंपनी या कई कंपनियों को मिलाकर पूरी की जा सकती है। अगर 10 साल पूरे नहीं हुए तो आप पेंशन के हकदार नहीं माने जाते। यही नियम कर्मचारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।
अगर कोई कर्मचारी 10 साल की नौकरी पूरी होने से पहले ही अपना पूरा PF और EPS का पैसा निकाल लेता है, तो वह भविष्य की मासिक पेंशन का अधिकार भी खो बैठता है। क्योंकि EPS से एकमुश्त पैसा निकालने का मतलब है कि आपने पेंशन योजना की सदस्यता खत्म कर दी है। इसके बाद वह अवधि आपकी पेंशन सर्विस से नहीं गिनी जाती है।
10 साल से कम सर्विस होने पर कर्मचारी फॉर्म 10C के जरिए EPS की राशि एकमुश्त निकाल सकता है, लेकिन इससे पेंशन बंद हो जाती है। वहीं, 10 साल या उससे अधिक सर्विस पर EPS का पैसा नहीं निकलता, बल्कि पेंशन सर्टिफिकेट मिलता है। इसके बाद 58 साल की उम्र में फॉर्म 10D भरकर मासिक पेंशन का दावा किया जा सकता है।