नयी दिल्ली, 13 फरवरी (भाषा) बाजार नियामक सेबी के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने शुक्रवार को वित्तीय प्रणाली में कृत्रिम मेधा (एआई) से पैदा हुए जोखिमों का उल्लेख करते हुए कहा कि नियमन को अब संस्थानों की निगरानी से आगे बढ़कर प्रणालियों और प्रौद्योगिकी की निगरानी की दिशा में विकसित होना होगा।
पांडेय ने यहां ‘ईटी नाउ ग्लोबल बिजनेस समिट 2026’ को संबोधित करते हुए कहा कि एक ओर एआई निगरानी और धोखाधड़ी पहचान के लिए शक्तिशाली साधन प्रदान करता है जबकि दूसरी ओर यह अपारदर्शिता, पक्षपात और तकनीकी शक्ति के केंद्रीकरण जैसे जोखिम भी लेकर आता है।
उन्होंने कहा, ‘विनियमन को परस्पर जुड़ाव और एकाग्रता जोखिमों का समाधान करना, डेटा प्रशासन और सहमति ढांचे को मजबूत करना तथा विनियमित वित्त और गैर-विनियमित डिजिटल क्षेत्रों के बीच की सीमा को स्पष्ट रूप से प्रबंधित करना होगा।’
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के प्रमुख ने कहा कि प्रौद्योगिकी बाजारों को नियम पुस्तिका से कहीं तेज गति से बदल रही है और गणना-पद्धति यानी एल्गोरिद्म पर आधारित कारोबार, डिजिटल मंच तथा एआई आधारित निर्णय अब बाजार संचालन का हिस्सा बन चुके हैं।
उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में सेबी ‘सुपटेक’ (पर्यवेक्षी प्रौद्योगिकी) और ‘रेगटेक’ (नियामकीय प्रौद्योगिकी), सुदृढ़ साइबर सुरक्षा ढांचे और बेहतर डेटा प्रशासन के माध्यम से कदम उठा रहा है।
पांडेय ने कहा कि प्रतिभूति बाजार परिवेश के लिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक रणनीतिक प्रौद्योगिकी मार्ग-मानचित्र तैयार करने हेतु एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ कार्य समूह भी गठित किया गया है।
उन्होंने कहा कि विनियमन अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं रह सकता, उसे पूर्वानुमान-परक होना होगा और बाजारों के साथ तालमेल बिठाना होगा।
सेबी प्रमुख ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में भारत का बाजार पूंजीकरण चार गुना से अधिक बढ़कर 470 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में इक्विटी और ऋण निर्गमों के जरिये 14.3 लाख करोड़ रुपये जुटाए गए, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 की अप्रैल-जनवरी अवधि में यह आंकड़ा 11.6 लाख करोड़ रुपये रहा।
वर्ष 2025 में भारत ने आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) गतिविधि में वैश्विक स्तर पर अग्रणी स्थान हासिल किया और जुटाई गई राशि के मामले में तीसरे स्थान पर रहा।
उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे बाजारों का विस्तार होता है, पूंजी की मात्रा के साथ विनियमन की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।”
भाषा प्रेम प्रेम रमण
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