Teejan Bai Biography : कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन मिली डॉक्टरेट की उपाधि! जानिए कैसे तीजन बाई बनीं दुनिया की ‘पंडवानी क्वीन’

पंडवानी की महान गायिका तीजन बाई का जीवन संघर्ष, प्रतिभा और समर्पण की मिसाल है। कभी स्कूल की दहलीज तक न पहुंचने वाली तीजन बाई को लोककला में अतुलनीय योगदान के लिए मानद डी.लिट. की उपाधि मिली और उन्होंने पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

Teejan Bai Biography  : कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन मिली डॉक्टरेट की उपाधि! जानिए कैसे तीजन बाई बनीं दुनिया की ‘पंडवानी क्वीन’

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Modified Date: July 5, 2026 / 01:58 pm IST
Published Date: July 5, 2026 1:53 pm IST
HIGHLIGHTS
  • बिना स्कूल गए मिली मानद डॉक्टरेट की उपाधि।
  • पंडवानी को देश ही नहीं, दुनियाभर में दिलाई नई पहचान।
  • पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण समेत कई राष्ट्रीय सम्मानों से हुईं सम्मानित।

रायपुर : Teejan Bai Biography  सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई के निधन से भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया है। तीजन बाई का जीवन इस बात का उदाहरण है कि अगर मन में अटूट लगन हो, तो औपचारिक शिक्षा की कमी भी सफलता के आड़े नहीं आ सकती। कभी स्कूल की दहलीज न लांघने वाली तीजन बाई को उनके असाधारण कलात्मक योगदान के लिए विश्वविद्यालय ने मानद डी.लिट. डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा था।

छुपकर सुनती थी महाभारत

24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में गुजरा। उनके कला के सफर की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी, जब वे अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कथाएं गाते हुए छिपकर सुनती थीं और उन्हें याद कर लेती थीं। उनकी इस अद्भुत प्रतिभा को पहचानकर उनके नाना ने ही उन्हें पंडवानी की बाकायदा शिक्षा देना शुरू किया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

बिलासपुर विश्वविद्यालय मानद डी.लिट. की उपाधि प्रदान की

Teejan Bai D Litt Honorary Doctorate Degree तीजन बाई ने उस दौर में रूढ़ियों को तोड़ा जब पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ में प्रस्तुति देना केवल पुरुषों तक सीमित माना जाता था। वे इस शैली को अपनाने वाली पहली महिला कलाकार बनीं। मंच पर उनकी दमदार आवाज, सजीव अभिनय और मंचीय अभिव्यक्ति अद्भुत थी। प्रस्तुति के दौरान उनके हाथ का रंगीन फुंदनेदार एकतारा दर्शकों की कल्पना में कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष तो कभी भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र बन जाता था। लोककला में इसी अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जैसे देश के सर्वोच्च सम्मान मिले। साथ ही, बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि प्रदान की।

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