प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों को हटाने के प्रावधान वाले विधेयक पर मसौदा रिपोर्ट अंगीकार करना स्थगित

प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों को हटाने के प्रावधान वाले विधेयक पर मसौदा रिपोर्ट अंगीकार करना स्थगित

प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों को हटाने के प्रावधान वाले विधेयक पर मसौदा रिपोर्ट अंगीकार करना स्थगित
Modified Date: July 17, 2026 / 04:26 pm IST
Published Date: July 17, 2026 4:26 pm IST

नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों पर गंभीर आरोपों के मामलों में उनके लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहने की स्थिति में उन्हें पद से हटाने का प्रावधान करने वाले 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर विचार कर रही संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) ने शुक्रवार को अपनी मसौदा रिपोर्ट को अंगीकार करने की प्रक्रिया फिलहाल स्थगित करने का निर्णय लिया।

समिति की अध्यक्ष और भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी ने बताया कि सदस्यों का मत था कि इस विषय पर और अधिक चर्चा की आवश्यकता है, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया।

इस संविधान संशोधन विधेयक पर गठित संयुक्त समिति ने अपनी मसौदा रिपोर्ट में पांच अनुशंसाएं की थीं। यह मसौदा रिपोर्ट हाल ही में समिति के सदस्यों के बीच वितरित की गई थी।

सारंगी ने कहा कि बीते शुक्रवार को जब समिति प्रत्येक अनुशंसा पर अलग-अलग मतदान कर रही थी, तब यह महसूस किया गया कि हितधारकों के साथ और व्यापक विचार-विमर्श तथा समिति के सदस्यों के बीच अतिरिक्त चर्चा की आवश्यकता है।

इसके बाद मसौदा रिपोर्ट को अपनाने की प्रक्रिया टालने का निर्णय लिया गया।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शप) की सांसद सुप्रिया सुले ने अपने असहमति नोट प्रस्तुत किए थे, लेकिन समिति द्वारा रिपोर्ट को अंगीकार करने का निर्णय स्थगित किए जाने के बाद उन्होंने इन्हें वापस ले लिया।

सारंगी ने कहा, ‘‘संयुक्त संसदीय समिति ने सर्वसम्मति से यह माना कि हितधारकों के साथ और अधिक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।’’

बैठक में मौजूद सदस्यों ने बताया कि समिति की दो अनुशंसाओं पर मतदान पहले ही हो चुका था और तीसरी सिफारिश पर चर्चा चल रही थी, तभी मसौदा रिपोर्ट को अपनाने की प्रक्रिया स्थगित करने का निर्णय लिया गया।

दिलचस्प है कि सत्तारूढ़ दल के कुछ सदस्यों ने भी पहली दो अनुशंसाओं के खिलाफ मतदान किया। हालांकि, बहुमत के आधार पर दोनों अनुशंसाओं स्वीकार कर ली गईं।

समिति ने सिफारिश की थी कि यदि प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री या मुख्यमंत्री गंभीर अपराधों के आरोप में लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहते हैं, तो न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक उन्हें पद से स्थायी रूप से हटाने के बजाय निलंबित किया जाए।

समिति ने यह भी प्रस्ताव किया था कि यदि संबंधित व्यक्ति बरी हो जाता है या निर्धारित अवधि के भीतर अभियोजन आगे नहीं बढ़ता है, तो उसका निलंबन स्वतः समाप्त हो जाए और उसे पुनः पद पर बहाल किया जा सकेगा।

समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि विधेयक के उद्देश्य एवं कारण विवरण में उल्लिखित ‘गंभीर आपराधिक मामले’ की परिभाषा को ‘‘ऐसे गंभीर आपराधिक अपराध, जिनमें अधिकतम पांच वर्ष या उससे अधिक कारावास का प्रावधान हो’’ के रूप में माना जाए।

समिति की अध्यक्ष अपराजिता सारंगी ने कहा कि सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के उद्देश्य से यह विधेयक लाई है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह राष्ट्रीय महत्व का विषय है। इस पर सर्वसम्मति होनी चाहिए।’’

सारंगी ने कहा कि देशहित के मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों को साथ आना चाहिए।

पिछले वर्ष अगस्त में पेश किए गए इस विधेयक में प्रावधान है कि यदि प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री या मुख्यमंत्री स्वयं इस्तीफा नहीं देते हैं और लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहते हैं, तो हिरासत के 31वें दिन उन्हें स्वतः पद से हटा दिया जाएगा।

विपक्ष ने इस विधेयक को विपक्ष शासित सरकारों को अस्थिर करने का माध्यम बताया था।

विधेयक पर विचार कर रही संयुक्त समिति से अधिकांश विपक्षी दलों ने दूरी बना ली थी।

समिति की मसौदा रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि ‘‘गंभीर आपराधिक मामले’’ से आशय ऐसे अपराधों से होना चाहिए, जिनमें पांच वर्ष या उससे अधिक कारावास का प्रावधान हो।

रिपोर्ट में ‘सनसेट क्लॉज’ अथवा ‘स्वतः समाप्ति प्रावधान’ शामिल करने की सिफारिश करते हुए कहा गया था कि यदि संबंधित मंत्री अदालत से बरी हो जाता है या निर्धारित अवधि में अभियोजन आगे नहीं बढ़ता है, तो उसका निलंबन स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए।

समिति ने कहा था कि यह सुरक्षा प्रावधान सुनिश्चित करेगा कि अदालत से दोषमुक्त पाए जाने वाले व्यक्ति का निलंबन स्थायी न बने और उसे दोबारा पद पर नियुक्त किया जा सके।

संयुक्त समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों से जुड़े मामलों की सुनवाई उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप फास्ट ट्रैक या विशेष अदालतों में की जाए।

समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि प्रस्तावित कानून में एक पृथक अनुसूची जोड़ी जाए, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक कारावास से दंडनीय अपराधों की सूची स्पष्ट रूप से दी जाए, ताकि यह तय किया जा सके कि किन अपराधों में पद से निलंबन लागू होगा।

भाषा हक

हक माधव

माधव


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