नयी दिल्ली, 12 अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने नयी कराधान व्यवस्था के तहत कुछ भत्तों को छूट देने को लेकर जारी विवाद के बीच आयकर विभाग को उच्च न्यायालय और शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों के आयकर रिटर्न की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने नयी आयकर व्यवस्था के तहत रिटर्न दाखिल करने वाले न्यायाधीशों के निजी सचिवों को निर्देश दिया है कि वे उनके (न्यायधीशों के) पैन नंबर सहित अन्य विवरण अधिकारियों के साथ साझा करें।
ये निर्देश ‘दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन’ की ओर से दायर याचिका पर 22 जुलाई और 10 अगस्त को जारी दो आदेशों में दिए गए।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, न्यायाधीशों को दिए जाने वाले कुछ भत्तों को उच्च न्यायालय न्यायाधीश (वेतन एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 1954 की धारा-22डी और उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (वेतन एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 1958 की धारा-23डी के तहत उनकी आय की गणना में पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता है।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने कहा कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने 12 सितंबर 2025 को जारी ज्ञापन में कहा कि न्यायाधीशों को मिलने वाले किराया मुक्त सरकारी आवास, वाहन भत्ता, आतिथ्य-सत्कार भत्ता और अवकाश यात्रा रियायत (एलटीसी) जैसे भत्ते नयी कर व्यवस्था के तहत कर मुक्त नहीं होंगे, क्योंकि इस व्यवस्था में किसी भी तरह की कटौती और छूट का प्रावधान नहीं है।
उच्च न्यायालय ने 22 जुलाई को सुनाए गए फैसले में कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि धारा 22डी और 23डी आयकर अधिनियम के सभी प्रावधानों पर भारी पड़ती हैं तथा याचिका में उठाए गए मुद्दे पर विचार किए जाने की जरूरत है।
अदालत ने साफ किया कि न्यायाधीश अपना आयकर रिटर्न या संशोधित रिटर्न दाखिल कर सकते हैं, जिसमें संबंधित भत्तों की राशि को “आय की प्रकृति में नहीं आने वाली प्राप्तियां” शीर्षक के तहत दिखाया जा सकता है।
उसने कहा, “उच्च न्यायालय और शीर्ष अदालत के माननीय न्यायाधीशों की ओर से दाखिल किए गए ऐसे रिटर्न पर अगले आदेश तक न तो कोई कार्रवाई की जाएगी और न ही उनका निपटारा किया जाएगा।”
आयकर विभाग के वकील ने 10 अगस्त को अदालत को बताया कि आयकर रिटर्न की प्रक्रिया इलेक्ट्रॉनिक तरीके से आगे बढ़ती है और सॉफ्टवेयर अपने आप यह पहचान नहीं सकता कि कौन-सा रिटर्न किसी वर्तमान न्यायाधीश का है।
उन्होंने कहा कि पूरी संभावना है कि अगस्त के आखिर तक करीब 98 फीसदी आयकर रिटर्न बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के स्वचालित तरीके से संसाधित हो जाएंगे।
इसके बाद उच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों के निजी सचिवों को संबंधित विवरण अधिकारियों को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। उसने कहा कि अगर रिटर्न की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कोई मांग उठाई जाती है तो याचिका के लंबित रहने तक उस पर रोक रहेगी।
अदालत ने कहा कि अगर कोई रकम वापस किए जाने लायक पाई जाती है, तो उसे वापस नहीं किया जाएगा। उसने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों को पहले ही लौटाई गई कोई भी रकम मामले के अंतिम निष्कर्ष के अधीन होगी।
भाषा पारुल वैभव
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