नयी दिल्ली, 30 जून (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने वर्ष 2020 में एक दुकानदार की हत्या की कोशिश करने के आरोपी तीन लोगों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष हमलावार के रूप में आरोपियों की पहचान साबित करने में नाकाम रहा, क्योंकि शिकायतकर्ता अपने बयान से मुकर गया और उसने उन आरोपियों में से किसी की भी पहचान नहीं की।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समर विशाल संगम विहार में 24 जुलाई 2020 को हुई गोलीबारी की घटना के सिलसिले में सुनील उर्फ भूरी, धीरज और भूपेंद्र के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 307 (हत्या की कोशिश) और 34 (साझा इरादा) के तहत आरोपों की सुनवाई कर रहे थे।
अदालत ने नौ जून के एक आदेश में कहा, ‘‘आपराधिक न्यायशास्त्र का यह एक बुनियादी सिद्धांत है कि संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता। अभियोजन पक्ष को अपने दम पर खड़ा होना होगा और बिना किसी उचित संदेह के आरोप साबित करने होंगे।’’
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों का पहले शिकायतकर्ता नवीन कुमार के साथ झगड़ा हुआ था, क्योंकि उसने बिना पैसे लिये कपड़े देने से मना कर दिया था।
आरोप है कि बाद में तीनों ने उसकी दुकान पर पत्थर फेंके और सुनील ने उसे मारने के इरादे से तमंचे से गोली चला दी। इसके बाद तीनों मोटरसाइकिल पर बैठकर भाग गए।
हालांकि, सुनवाई के दौरान नवीन कुमार ने गवाही दी कि उसने गोलीबारी होते हुए नहीं देखी थी और शोर-शराबा सुनकर बाहर आया था।
उसने अदालत को बताया कि लोगों ने उसे घटना के बारे में बताया और साफ तौर पर कहा कि उसने आरोपियों को पहले कभी नहीं देखा था। उसने पुलिस के सामने उनपर आरोप लगाने या जांच के दौरान उनकी पहचान करने की बात से भी इनकार कर दिया।
अदालत ने कहा, ‘‘उनके (शिकायतकर्ता) द्वारा पेश किए गए सबूत मुख्य रूप से सुनी-सुनाई बातों पर आधारित हैं और इन्हें अपराधियों की पहचान के सबूत के तौर पर नहीं माना जा सकता।’’
अदालत ने यह भी कहा कि शस्त्र अधिनियम के एक अलग मामले में सुनील के पास से तमंचा बरामद होने से इस मामले में उसकी संलिप्तता साबित नहीं होती।
भाषा संतोष सुरेश
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