नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) चंडीगढ़ प्रशासन ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें 2020 के कथित दंगा मामले में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान समेत आम आदमी पार्टी (आप) के कई नेताओं के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दी गयी थी।
पिछले वर्ष 29 नवंबर को उच्च न्यायालय ने इस मामले में मान और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी, आरोपपत्र और उसके बाद की सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया था।
जनवरी 2020 में चंडीगढ़ में दर्ज प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि मान समेत आम आदमी पार्टी के कई नेता तथा कार्यकर्ता एक प्रदर्शन के लिए एकत्रित हुए थे और कार्यकर्ताओं को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री के आवास का घेराव करने के लिए उकसाया गया था।
यह भी आरोप था कि बिजली दरों में बढ़ोतरी के विरोध में निकाले गए प्रदर्शन मार्च के दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की की थी।
शुक्रवार को केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ की ओर से दायर याचिका पर भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने सुनवाई की।
चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से पेश वकील ने कुछ समय मांगा और कहा कि वे उन अन्य लोगों के संबंध में भी याचिका दायर करेंगे, जिन्हें उच्च न्यायालय ने मामले में राहत दी थी।
अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा था कि जुलाई 2021 में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पूर्व भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 147 (दंगा करने के लिए सजा) समेत विभिन्न धाराओं के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया था।
उच्च न्यायालय में मान समेत याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने दलील दी थी कि उनके खिलाफ किसी विशेष हिंसक कृत्य या चोट पहुंचाने का आरोप नहीं लगाया गया है।
उन्होंने यह भी कहा था कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत कोई निषेधाज्ञा लागू नहीं थी, इसलिए पुलिस उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन या मार्च करने से नहीं रोक सकती थी।
हालांकि, चंडीगढ़ प्रशासन के वकील ने उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि याचिकाकर्ता अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ एक गैरकानूनी राजनीतिक प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे, जो ‘‘उग्र’’ हो गया था।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था, ‘‘प्रदर्शनकारियों को मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने से रोकने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि सीआरपीसी की धारा 144 के तहत कोई निषेधाज्ञा लागू नहीं थी।’’
मामले को रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था कि याचिकाकर्ताओं पर सार्वजनिक सेवकों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने के लिए हमला करने, चोट पहुंचाने या आपराधिक बल प्रयोग करने का कोई स्पष्ट आरोप नहीं है।
भाषा गोला नरेश
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