तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद महिलाओं की जिंदगी बयां करती है ‘सिटी आफ विडोज़’

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तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद महिलाओं की जिंदगी बयां करती है ‘सिटी आफ विडोज़’

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  • Publish Date - July 31, 2026 / 07:22 PM IST,
    Updated On - July 31, 2026 / 07:22 PM IST

नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) अमेरिकी सेनाएं फरवरी 2020 में अफगानिस्तान को उसके नए शासक तालिबान के हवाले करके लौट रही थीं लेकिन तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद देश की उन आजाद ख्याल महिलाओं पर क्या बीती जो पिछले 20 सालों में देश में नेतृत्वकारी भूमिकाएं संभाल रही थीं।

प्रसिद्ध लेखिका नादिया हाशमी का नवीनतम उपन्यास ‘सिटी आफ विडोज़’ ऐसी ही अफगानी महिलाओं की जिंदगी पर केंद्रित है जिनकी दुनिया तालिबान के पुन: सत्ता पर कब्जा करने के बाद रातोंरात बदल गई थी।

प्रकाशक हार्पर कॉलिन्स द्वारा यहां जारी एक बयान के अनुसार, यह उपन्यास एक दिलचस्प और डरावनी लेकिन आखिर में उम्मीद जगाने वाली कहानी बयां करता है। यह कहानी तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद के सालों में अफ़गानिस्तान की महिलाओं की ज़िंदगी पर आधारित है।

फरवरी 2020 में, लगभग बीस साल के कब्ज़े के बाद अमेरिका ने अफ़गानिस्तान से अपनी सेनाएं वापस बुलानी शुरू कर दी थीं। इन बीस सालों में अफ़गानी महिलाओं की एक ऐसी पूरी पीढ़ी बड़ी हुई थी जो आजाद ख्याल थी और जिंदगी के हर मोर्चे पर अगुवाई कर रही थी।

किताब की प्रस्तावना में कहा गया है कि ये महिलाएं जो काफी हद तक शांति के माहौल में पली-बढ़ीं थीं, स्कूल गई थीं, नौकरी-पेशा थीं और यहां तक कि उन्होंने सेना और संसद में भी काम किया था। अफ़गानिस्तान की इन्हीं महिलाओं ने देखा कि तालिबान फिर से सड़कों पर कब्ज़ा कर रहा है। उन्हें पता था कि सब कुछ बदलने वाला है।

किताब की कथा वस्तु कुछ इस प्रकार है कि काबुल जैसे हलचल भरे और आधुनिक शहर में महिलाएं टीवी न्यूज़कास्टर, दुकान की मालकिन, डॉक्टर, शिक्षक, वकील और यहां तक कि सैनिक भी हैं। इनमें मरजान भी शामिल है, जिसने अफ़गानी सेना के साथ लड़ाई लड़ी थी और अब वह अपनी बेटी हवा को सुरक्षित रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है।

किताब के अनुसार, पहले मरजान का नाम रहीमा था और वह ‘बाचा पोश’ की तरह रहती थी—यानी एक ऐसी लड़की जिसे बड़ी होने तक लड़के की तरह पाला-पोसा गया। रहीमा ने अपने पूर्व सैनिक पति के चंगुल से छूटने के बाद मरजान नाम अपना लिया। उसने अपने लिए एक नई ज़िंदगी बनाई थी जिसे वह आसानी से नहीं छोड़ना चाहती थी। तालिबान के राज में भी नहीं।

इसी प्रकार, होंठों पर लाल लिपस्टिक लगाकर सेना की सिर्फ़ महिलाओं वाली कॉम्बैट फ़ोर्स की अगुवाई करने वाली सोराया अब एक ‘वॉन्टेड’ महिला है। उसका भाई उसे तालिबान से बचाने के लिए पनाह देने को राजी नहीं है। उसका क्या होगा? या मीना, एक पत्रकार और ब्रॉडकास्टर, जिसका खूबसूरत चेहरा काबुल में हर कोई जानता है—यहां तक कि नई सरकार के लोग भी?

अपनी काबिलियत के दम पर खड़ी हुईं इन अफगानी महिलाओं के सामने अब तालिबान के राज में क्या विकल्प है? लड़ें या भाग जाएं? या कोई तीसरा रास्ता ढूंढें? एक बात तो पक्की है: इनमें से कोई भी महिला चुपचाप अपनी किस्मत को स्वीकार नहीं करेगी।

हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित ‘सिटी आफ विडोज़’ इसी डर, विरोध, बदलाव और नई शुरुआत की एक कहानी है जो इतिहास के एक अहम मोड़ पर खड़ी उन अविस्मरणीय अफ़गानी महिलाओं की आवाज़ बनती है।

‘दी पर्ल दैट ब्रोक इट्स शैल’ बेस्टसेलर समेत चार किताबों की लेखिका नादिया हाशमी अप्रवासी अफगानी माता पिता की संतान हैं। पेशे से बाल रोग चिकित्सक नादिया इस समय अमेरिका में रहती हैं।

भाषा नरेश नरेश पवनेश

पवनेश