नयी दिल्ली, 24 जनवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को तुर्कमान गेट हिंसा मामले के एक आरोपी को जमानत दे दी। इस व्यक्ति की जमानत याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था और मामले को पुनर्विचार के लिए निचली अदालत में वापस भेज दिया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जोगिंदर प्रकाश नाहर आरोपी उबैदुल्ला की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जो इस महीने की शुरुआत में तुर्कमान गेट स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास अतिक्रमण हटाए जाने के अभियान के दौरान पथराव करने वाली भीड़ में कथित तौर पर शामिल था।
अदालत ने कहा, ‘‘उपरोक्त मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, इस आरोपी का पथराव करने वाली भीड़ या नारे लगाने वाली भीड़ से प्रथम दृष्टया कोई संबंध नहीं दिखता। मामले की विस्तृत जांच की जानी चाहिए। 25 साल की उम्र के इस आरोपी को आगे हिरासत में रखने से कोई लाभ नहीं होगा।’’
आरोपी के वकीलों एएफ फैजी और एमके मलिक ने अपने मुवक्किल के लिए जमानत का अनुरोध करते हुए दलील दी कि उबैदुल्ला भीड़ का हिस्सा नहीं था और वह सिर्फ अपनी नाबालिग बहन का पता लगाने के लिए घर से बाहर निकला था।
फैजी ने कहा, ‘‘अगर आप सीसीटीवी फुटेज देखेंगे, तो वह (उबैदुल्ला) अपनी नाबालिग बहन को ढूंढने के लिए घर से बाहर निकला था, जो उसे नहीं मिली। आप वीडियो में देख सकते हैं कि उसने पहले एक बच्चे से बात की; वह सिर्फ अपनी बहन के बारे में पूछ रहा था।’’
जमानत का विरोध करते हुए अतिरिक्त लोक अभियोजक ज्ञान चंद्र सोनी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि आरोपी को यह जानते हुए भी कि उस क्षेत्र में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 163 (अशांति या संभावित खतरे के मामलों में आदेश जारी करने का अधिकार) लागू है, वह भीड़ में शामिल था।
उन्होंने कहा, ‘‘जांच जारी है और सीसीटीवी फुटेज से पता चलता है कि आरोपी हिंसा के समय वहां मौजूद था। उसके खिलाफ लगे आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं।’’
न्यायाधीश ने इस तथ्य पर गौर करते हुए कि आरोपी का निवास हिंसा स्थल के पास था, जांच अधिकारी (आईओ) से सीसीटीवी फुटेज के अलावा और सबूत मांगे, क्योंकि सीसीटीवी फुटेज में वह भीड़ का हिस्सा नहीं दिख रहा है।
भाषा शफीक पारुल
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