जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों को गिराने का आदेश अन्यायपूर्ण: पर्सनल लॉ बोर्ड

जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों को गिराने का आदेश अन्यायपूर्ण: पर्सनल लॉ बोर्ड

जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों को गिराने का आदेश अन्यायपूर्ण: पर्सनल लॉ बोर्ड
Modified Date: July 17, 2026 / 07:15 pm IST
Published Date: July 17, 2026 7:15 pm IST

नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता आजम खान द्वारा स्थापित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों को ध्वस्त करने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले की शुक्रवार को आलोचना की और कहा कि यह ‘‘पक्षपातपूर्ण, प्रतिशोध की भावना से प्रेरित और अन्यायपूर्ण’’ कार्रवाई है।

बोर्ड ने राज्य सरकार से प्रस्तावित कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने और ध्वस्तीकरण का आदेश वापस लेने की मांग भी की।

बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि यह कार्रवाई केवल एक शैक्षणिक संस्थान के खिलाफ नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय की शैक्षणिक प्रगति के खिलाफ भी है।

उन्होंने दावा किया कि सरकारें मुस्लिम समुदाय की शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने में पर्याप्त प्रयास करने में विफल रही हैं, जबकि जनता की भागीदारी, त्याग और लंबे प्रयासों से स्थापित शैक्षणिक संस्थानों को किसी न किसी बहाने प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई के जरिए निशाना बनाया जा रहा है।

इलियास ने आरोप लगाया कि मौजूदा कार्रवाई एक ओर आजम खान के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध को दर्शाती है और दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय की शैक्षणिक प्रगति को और कमजोर करने का प्रयास है।

उन्होंने रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के इस दावे को भी खारिज किया कि विश्वविद्यालय के 40 में से 38 भवन बिना आवश्यक स्वीकृति के बनाए गए थे।

इलियास ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार जिन भवनों पर कार्रवाई की जा रही है, उनके निर्माण के समय यह क्षेत्र रामपुर विकास प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था, इसलिए भवन निर्माण की स्वीकृति लेने का कोई कानूनी प्रावधान लागू नहीं था।

उल्लेखनीय है कि रामपुर विकास प्राधिकरण ने जेल में बंद सपा नेता आजम खान द्वारा स्थापित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों को भवन निर्माण की स्वीकृति नहीं लेने का हवाला देते हुए ध्वस्त करने का आदेश दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि भवनों के निर्माण के समय यह क्षेत्र आरडीए के अधिकार क्षेत्र में नहीं था, जबकि प्राधिकरण का कहना है कि निर्माण के समय सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य था।

भाषा हक हक पवनेश

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