अहमदाबाद, 30 जून (भाषा) गुजरात उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि यदि ‘सप्तपदी’ जैसी पारंपरिक रस्में और समारोह आयोजित नहीं किए जाते हैं, तो केवल पंजीकरण के आधार पर हिंदू विवाह को वैध नहीं माना जा सकता।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पारंपरिक समारोह, अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक अस्तित्व को शुद्ध और परिवर्तित करते हैं।
यह फैसला पिछले साल नवंबर में एक पारिवारिक अदालत द्वारा दिए गए आदेश को रद्द करते हुए आया है।
पारिवारिक अदालत ने पक्षों के बीच हुए कथित विवाह को अमान्य घोषित करने से इनकार कर दिया था, जिसे ब्रिटेन में रहने वाले एक व्यक्ति ने चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति इलेश वोरा और न्यायमूर्ति आर टी वाच्छानी की खंडपीठ ने कहा कि सप्तपदी जैसी आवश्यक रस्म हिंदू विवाह का आधार है।
यह मामला अपीलकर्ता कौशल सोनार से जुड़ा है, जिन्होंने विवाह को अमान्य घोषित करने की मांग की थी।
सोनार ने अदालत को बताया कि उन्हें इस कथित विवाह के बारे में तब पता चला जब प्रतिवादी महिला ने उनके माता-पिता से संपर्क किया और एक विवाह प्रमाण पत्र सौंपकर दावा किया कि वह उनकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है।
उन्होंने दावा किया कि उन्होंने प्रतिवादी के साथ कभी कोई विवाह नहीं किया, कोई हिंदू रस्में नहीं निभाईं और न ही कभी पति के रूप में उसके साथ रहे।
उच्च न्यायालय ने पाया कि जब प्रतिवादी महिला ने पारिवारिक अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि पक्षों के बीच विवाह की कोई रस्म या समारोह नहीं हुआ था और दोनों के बीच कभी पति-पत्नी का रिश्ता नहीं रहा, तो पारिवारिक अदालत ने अपीलकर्ता द्वारा दायर याचिका को खारिज कर गलती की।
अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा सात का हवाला दिया, जिसमें विवाह को पूर्ण और बाध्यकारी बनाने के लिए पारंपरिक रस्मों और समारोहों का जिक्र है।
अदालत ने कहा कि चूंकि विवाह की कोई रस्म और समारोह आयोजित नहीं किया गया था, इसलिए इस मामले में हिंदू विवाह की बुनियादी और आवश्यक शर्तें पूरी नहीं होती हैं।
भाषा सुमित अविनाश
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