भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने के लिए सोच बदलने की ज़रूरत: जितेंद्र सिंह

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भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने के लिए सोच बदलने की ज़रूरत: जितेंद्र सिंह

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  • Publish Date - June 11, 2026 / 07:34 PM IST,
    Updated On - June 11, 2026 / 07:34 PM IST

अहमदाबाद, 11 जून (भाषा) केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने बृहस्पतिवार को यहां कहा कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सोच बदलने एवं निजी निवेश के साथ-साथ इसमें भागीदारी बढ़ाने की ज़रूरत है।

उन्होंने यह भी कहा कि 1980 के दशक में चीन ने बिना किसी सरकारी योजना के विज्ञान और प्रौद्योगिकी में बड़े पैमाने पर निवेश किया क्योंकि उसका मानना ​​था कि विज्ञान के लिए सिर्फ़ पैसे की ज़रूरत होती है, न कि बोलने या प्रेस की आज़ादी की।

मंत्री ने कहा कि मानव कल्याण के लिए अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना भी एक तरह की पूजा और परोपकार है।

सिंह अहमदाबाद में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (इन-स्पेस) के 10वें ‘इंडस्ट्री कनेक्ट’ को संबोधित कर रहे थे।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री ने कहा, ‘‘दोनों पक्षों (निजी और सरकारी) की मानसिकता खुलने में अधिक समय लग रहा है। इसमें एक या दो पीढ़ियाँ लगेंगी, क्योंकि हमारे वैज्ञानिकों की पिछली पीढ़ी गोपनीयता के घेरे में काम करने की आदी थी। इसलिए, हमें अधिक प्रतिस्पर्धी बनने और अपने भविष्य के अभियानों में अधिक आक्रामक होने के लिए निजी निवेश एवं निजी भागीदारी को बढ़ाने की आवश्यकता है।’’

सिंह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष वी. नारायणन और उद्योग जगत के नेताओं की उपस्थिति में इन-स्पेस के अध्यक्ष डॉ. पवन गोयनका के साथ संवाद कर रहे थे।

बातचीत के दौरान, सिंह ने कहा कि प्रौद्योगिकी को बड़े स्तर पर ले जाने में सबसे बड़ी चुनौती पैसे जुटाने की है।

उन्होंने कहा, ‘‘लोग अक्सर चीन की प्रगति की तुलना भारत से करते हैं, लेकिन चीन ने 1980 के दशक में बिना किसी सरकारी योजना के सारा पैसा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में लगा दिया।’’

सिंह ने कहा, ‘‘उसका (चीन का) मानना ​​था कि विज्ञान के लिए प्रेस की स्वतंत्रता या बोलने की स्वतंत्रता की आवश्यकता नहीं है, बस पैसे की ज़रूरत है। इसलिए, वहां आयुष्मान, लाडली बेटी, उज्ज्वला या पीएम-किसान जैसी कोई योजना नहीं है। लेकिन इसके बावजूद, अगर हम प्रतिस्पर्धा में हैं, तो यही हमारी ताकत है।’’

भाषा नेत्रपाल नरेश

नरेश