ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण आवेदन में अनिवार्य घोषणा के प्रावधान का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं: ब्रिटास

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ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण आवेदन में अनिवार्य घोषणा के प्रावधान का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं: ब्रिटास

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  • Publish Date - July 13, 2026 / 09:23 PM IST,
    Updated On - July 13, 2026 / 09:23 PM IST

नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्यसभा सदस्य जॉन ब्रिटास ने सोमवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर मतदाता पंजीकरण के ऑनलाइन आवेदन पत्र में अनिवार्य घोषणा का प्रावधान जोड़े जाने पर आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि यह बदलाव बिना किसी वैधानिक आधार के किया गया है।

ब्रिटास ने अपने पत्र में कहा कि निर्वाचन आयोग के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से निर्वाचक नामावली में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करने वाले लोगों से अब यह अनिवार्य रूप से घोषित करने को कहा जा रहा है कि उनका अथवा उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम अंतिम विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान निर्वाचक नामावली में दर्ज था या नहीं और उनसे संबंधित पुराने निर्वाचन रिकॉर्ड का विवरण भी मांगा जा रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि जहां ऑनलाइन आवेदन पत्र में इस घोषणा को अनिवार्य बनाया गया है, वहीं निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित आवेदन पत्र में इससे संबंधित कोई संशोधन नहीं किया गया है और न ही विधि एवं न्याय मंत्रालय ने ऐसी कोई राजपत्र अधिसूचना जारी की है, जो इस बदलाव को अधिकृत करती हो।

ब्रिटास ने कहा, ‘‘निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित किसी वैधानिक आवेदन पत्र को प्रशासनिक निर्देशों या सॉफ्टवेयर में बदलाव के जरिए दोबारा नहीं लिखा जा सकता। कोई ऑनलाइन पोर्टल राजपत्र नहीं होता और सॉफ्टवेयर कोड कानून नहीं होता।’’

उन्होंने कहा कि यदि मतदाता पंजीकरण से जुड़े वैधानिक प्रावधानों में नियमों में संशोधन किए बिना केवल ऑनलाइन पोर्टल में बदलाव के जरिए परिवर्तन की अनुमति दी जाती है, तो इससे कानून के शासन का सिद्धांत कमजोर होगा।

ब्रिटास ने दावा किया कि यह अनिवार्य शर्त पहली बार मतदान करने वालों, प्रवासियों, गोद लिए गए बच्चों, अनाथों और ऐसे अन्य लोगों पर अनुचित बोझ डालेगी, जिनके पास अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी के दशकों पुराने निर्वाचन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की संवैधानिक गारंटी को ऐसी तकनीकी बाधाओं के जरिए कमजोर नहीं किया जा सकता, जिनका कोई वैधानिक आधार नहीं है।’

उन्होंने आग्रह किया कि इस प्रावधान को वापस लिया जाए।

भाषा हक अविनाश

अविनाश

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