ओडिशा : दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई का वाम दलों ने किया विरोध

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ओडिशा : दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई का वाम दलों ने किया विरोध

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  • Publish Date - July 20, 2026 / 05:03 PM IST,
    Updated On - July 20, 2026 / 05:03 PM IST

भुवनेश्वर, 20 जुलाई (भाषा) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की ओडिशा इकाइयों ने वर्ष 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह की समय-पूर्व रिहाई का विरोध किया है।

दोनों राजनीतिक दलों ने उच्चतम न्यायालय और राज्य सरकार से उसकी सजा में छूट की अर्जी खारिज करने की अपील की है।

दोनों वामपंथी दलों ने अलग-अलग बयान जारी किए। इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने 14 जुलाई के अपने आदेश में ओडिशा सरकार को दारा सिंह की सजा में छूट की याचिका पर एक महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया था।

इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 अगस्त की तिथि तय की गयी है।

दारा सिंह (63) ने वर्ष 2024 में उच्चतम न्यायालय में समय-पूर्व रिहाई की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। उसने दावा किया था कि वह 24 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है और ‘युवा अवस्था के आवेश’ में किए गए अपने कृत्य पर उसे पश्चाताप है।

याचिका में उसने कहा कि वह कर्म के सिद्धांत में विश्वास करता है और स्वयं को सुधारने तथा ‘सेवा-उन्मुख कार्यों’ के माध्यम से समाज के प्रति योगदान देने का अवसर चाहता है।

दारा सिंह की इस याचिका का विरोध करते हुए दोनों वाम दलों ने कहा कि सांप्रदायिक प्रकृति के जघन्य अपराध में दोषी ठहराए गए व्यक्ति के प्रति नरमी बरतने से न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास कमजोर होगा और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को आघात पहुंचेगा।

भाकपा की ओडिशा राज्य परिषद ने एक बयान में कहा, ‘‘भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली ओडिशा सरकार द्वारा दारा सिंह की समय-पूर्व रिहाई सुनिश्चित करने के कथित प्रयास की भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) कड़ी निंदा करती है। ऐसा कदम न्याय की भावना के विरुद्ध है, कानून के शासन को कमजोर करता है और राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द तथा कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।’’

भाकपा ने उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया कि वह दारा सिंह की सजा में छूट की याचिका पर सावधानीपूर्वक विचार करे। पार्टी ने ‘बिलकिस बानो’ मामले के दोषियों को दी गई सजा में छूट को बाद में न्यायपालिका द्वारा रद्द किए जाने का भी उल्लेख किया।

पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि दारा सिंह का संबंध अन्य सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं से भी रहा है, जिनमें मयूरभंज में कपड़ा व्यापारी शेख रहमान तथा वर्ष 1999 में मिशनरी फादर अरुल दॉस की हत्या शामिल है।

भाकपा ने यह भी दावा किया कि पिछले दो वर्षों में ओडिशा में सांप्रदायिक घृणा, जातीय हिंसा, पीट-पीटकर हत्या और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि हुई है तथा दारा सिंह की रिहाई से कानून-व्यवस्था की स्थिति और बिगड़ सकती है।

माकपा के राज्य सचिव सुरेश पाणिग्रही ने कहा, ‘‘ऐसे दोषी की रिहाई न केवल न्याय व्यवस्था के उद्देश्य को विफल कर देगी, बल्कि सांप्रदायिक ताकतों, संगठित अपराधियों और नफरत की राजनीति करने वालों को भी खतरनाक संदेश देगी।’’

उन्होंने कहा, ‘‘माकपा को आशंका है कि भाजपा सरकार में ऐसे मामलों में उठाए जा रहे कदम सांप्रदायिक राजनीति के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। अपराधियों का महिमामंडन करना या उन्हें राजनीतिक संरक्षण देना लोकतंत्र, संविधान और कानून के शासन का अपमान है।’’

इस हत्याकांड के सिलसिले में वर्ष 1999 और 2000 के बीच दारा सिंह सहित कुल 50 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें से 37 लोगों को तीन वर्ष के भीतर बरी कर दिया गया।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की एक अदालत ने सितंबर 2003 में दारा सिंह को फांसी और 12 अन्य आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में ओडिशा उच्च न्यायालय ने 11 सह-दोषियों को बरी कर दिया, जबकि दारा सिंह और महेंद्र हेंब्रम की सजा बरकरार रखी।

मई 2005 में उच्च न्यायालय ने दारा सिंह की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था। उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 2011 में इस फैसले को बरकरार रखा।

अप्रैल 2025 में महेंद्र हेंब्रम को ‘अच्छे आचरण’ के आधार पर 25 वर्ष की सजा पूरी करने के बाद क्योंझर जेल से रिहा कर दिया गया था।

मामले का एक अन्य आरोपी (जो अपराध के समय नाबालिग था) उस पर अलग से किशोर न्यायालय में मुकदमा चला था और उसे वर्ष 2008 में रिहा कर दिया गया था।

भाषा रवि कांत सुरेश

सुरेश