दुष्कर्म के प्रयास पर पटना उच्च न्यायालय के फैसले से बहस तेज, न्यायाधीशों के प्रशिक्षण की मांग उठी
दुष्कर्म के प्रयास पर पटना उच्च न्यायालय के फैसले से बहस तेज, न्यायाधीशों के प्रशिक्षण की मांग उठी
(कोमल शर्मा)
नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) दुष्कर्म से जुड़े मामलों की अदालतों द्वारा की जाने वाली व्याख्या को लेकर बहस पटना उच्च न्यायालय की एक टिप्पणी के बाद और तेज हो गई है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और एक अधिवक्ता का कहना है कि न्यायिक तर्क कानून, संवैधानिक मूल्यों और पीड़िता की गरिमा के अनुरूप होने चाहिए।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने एक मामले में कहा है कि किसी महिला का सलवार उतारने का प्रयास करना और उसके स्तनों को दबाना, दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना जा सकता।
इस टिप्पणी पर उच्चतम न्यायालय ने कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि वह इस मुद्दे पर विस्तृत आदेश जारी करेगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने ऐसे फैसले सुनाए जाने से पहले ‘‘पर्याप्त और गहन शोध के अभाव’’ पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भयाना ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में पटना उच्च न्यायालय की टिप्पणी को ‘‘बेहद असंवेदनशील’’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि कई न्यायाधीश पुरुष वर्चस्ववादी सोच रखते हैं, उनकी मानसिकता पितृसत्तात्मक है और वे महिलाओं के प्रति असंवेदनशील हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘वे (न्यायाधीश) भी पुरुष वर्चस्ववादी हैं। उनकी सोच बेहद पितृसत्तात्मक है और वे स्वयं महिलाओं के प्रति बहुत असंवेदनशील हैं। सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति न्यायाधीश बन गया है, इसका मतलब यह नहीं कि वह लैंगिक रूप से संवेदनशील या निष्पक्ष भी है।’’
भयाना ने कहा कि न्यायपालिका के सभी स्तरों पर न्यायाधीशों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता और कानूनी प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम पुलिस, स्कूलों और कॉर्पोरेट संस्थानों के लिए तो आयोजित किए जाते हैं, लेकिन न्यायाधीशों के लिए नहीं।
भयाना ने कहा, ‘‘न्यायाधीशों को भी सिखाने की जरूरत है। हमें उन लोगों को शिक्षित करना होगा, जो कानून की व्याख्या और फैसले करते हैं। अन्यथा ऐसे लोगों से न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?’’
‘समाधान अभियान’ नामक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की संस्थापक एवं निदेशक अर्चना अग्निहोत्री ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों के लिए कानून की सही समझ और उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
उन्होंने पटना उच्च न्यायालय की टिप्पणियों को ‘‘चौंकाने वाला’’ बताया।
अग्निहोत्री ने कहा, ‘‘कानून बिल्कुल स्पष्ट है… वे (न्यायाधीश) कानून तक नहीं पढ़ते। न्यायाधीश होने के बावजूद वे इस तरह की टिप्पणियां कर रहे हैं। यह बेहद शर्मनाक है। यौन अपराधों से जुड़े मामलों पर न्यायाधीशों को उचित प्रशिक्षण की जरूरत है, क्योंकि उन्हें स्वयं नहीं पता कि वे क्या कह रहे हैं।’’
महिला अधिकार कार्यकर्ता शोभा विजेंदर ने कहा कि दुष्कर्म की एक स्पष्ट कानूनी परिभाषा है और जो भी मामला उस कानूनी परिभाषा के दायरे में आता है, उससे उसी के अनुसार निपटा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘दुष्कर्म की एक कानूनी परिभाषा है। जो भी मामला उस कानूनी दायरे में आता है, उसे दुष्कर्म माना जाना चाहिए। जो उस कानूनी परिभाषा पर खरा नहीं उतरता, वह स्पष्ट रूप से दुष्कर्म नहीं है।’’
शोभा ने कहा, ‘‘वे दुष्कर्म के प्रयास, छेड़छाड़ या महिला पर पड़ने वाले मानसिक और शारीरिक प्रभावों के बारे में नहीं सोचते। ऐसी घटनाएं किसी महिला को गहराई से प्रभावित करती हैं, केवल उस समय ही नहीं बल्कि जीवनभर इसका असर बना रहता है।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि पटना उच्च न्यायालय ने फरवरी में आए उच्चतम न्यायालय के एक हालिया फैसले की अनदेखी की, जबकि उस मामले के तथ्य लगभग समान थे।
उन्होंने कहा, ‘‘उस मामले में भी आरोपी ने पीड़िता का सलवार खोल दिया था और उसके साथ दुष्कर्म का प्रयास किया था। उच्चतम न्यायालय ने उसे दुष्कर्म के प्रयास का मामला माना था।’’
करुणा नंदी ने कहा कि यदि उच्च न्यायालय को लगा था कि दोनों मामलों के तथ्य अलग हैं, तब भी उसे उच्चतम न्यायालय के फैसले पर विचार करते हुए अपने निर्णय में उस अंतर का उल्लेख करना चाहिए था।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘‘प्रधान न्यायाधीश ने बिल्कुल सही कहा कि इस मामले में अधिक शोध किया जाना चाहिए था। यदि उच्च न्यायालय को लगता था कि यह मामला उच्चतम न्यायालय द्वारा तय किए गए मामले से अलग है, तो उसे अपने फैसले में उस अंतर को स्पष्ट करना चाहिए था। लेकिन पटना उच्च न्यायालय के फैसले में उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय का उल्लेख तक नहीं किया गया।’’
भाषा शफीक अविनाश
अविनाश

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