नयी दिल्ली, 30 जून (भाषा) रेलवे बोर्ड ने कुछ जोनल इकाइयों द्वारा धातु के कबाड़ को पहिया निर्माण कारखानों को भेजने के बजाय बेचने पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि इससे वर्ष 2026-27 में पहिया निर्माण लक्ष्यों में बाधा आने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
बोर्ड ने 2007 और 2008 के अपने पिछले परिपत्रों में सभी जोन को भारी पिघलने योग्य कबाड़, अनुपयोगी एक्सल और इसी तरह की सामग्री की बिक्री बंद करने तथा इन्हें केवल कर्नाटक के येलहंका स्थित रेल व्हील फैक्टरी (आरडब्ल्यूएफ) और बिहार के बेला स्थित रेल व्हील प्लांट (आरडब्ल्यूपी) को भेजने का निर्देश दिया था ताकि इनसे पहिए व एक्सल बनाए जा सकें।
बोर्ड ने 17 जून को एक पत्र में प्रत्येक जोन को एक निर्धारित अवधि में उत्पन्न होने वाले अनुमानित कबाड़ की मात्रा के आधार पर आपूर्ति का लक्ष्य तय किया, जिसे इन दोनों निर्माण इकाइयों को भेजा जाना है।
बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे के प्रधान मुख्य सामग्री प्रबंधकों को संबोधित करते हुए 29 जून की तारीख वाले एक पत्र में कहा, “हालांकि यह देखा गया है कि कुछ जोनल रेलवे अब भी भारी धातु के कबाड़ का ई-नीलामी के माध्यम से निपटान कर रहे हैं। ”
बोर्ड ने कहा, “यह समझना आवश्यक है कि भारी धातु का कबाड़ दोनों उत्पादन इकाइयों में पहिया निर्माण के लिए प्राथमिक कच्चा माल है। इस महत्वपूर्ण सामग्री की किसी भी प्रकार की कमी सीधे इन महत्वपूर्ण उत्पादन इकाइयों में पहिया निर्माण कार्य को बाधित और रोक सकती है।”
अधिकारियों ने बताया कि इन कारखानों में पहियों का निर्माण विभिन्न जोन से नियमित रूप से प्राप्त होने वाले कबाड़ का उपयोग कर किया जाता है और बाहर से कोई सामग्री नहीं खरीदी जाती क्योंकि रेलवे में उत्पन्न कबाड़ वार्षिक उत्पादन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त होता है।
वित्त वर्ष 2026–27 के दौरान आपूर्ति किए जाने वाले कबाड़ की कुल मात्रा 1,52,800 मीट्रिक टन (एमटी) निर्धारित की गई है।
रेलवे बोर्ड द्वारा निर्देश जारी करने से पहले, दोनों फैक्ट्रियों ने पहिया निर्माण के लिए अपनी वार्षिक कबाड़ आवश्यकताओं को बताते हुए बोर्ड और रेलवे जोनों को पत्र लिखा था।
पूर्वी रेलवे, दक्षिण मध्य रेलवे और उत्तरी रेलवे जैसे जोन को कबाड़ की सबसे अधिक मात्रा आवंटित की गई है, जो क्रमशः 19,000 मीट्रिक टन, 16,100 मीट्रिक टन और 15,100 मीट्रिक टन है।
भाषा जितेंद्र नरेश
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