दो गुट, दो राहें: अभूतपूर्व राजनीतिक विभाजन से जूझ रहे तृणमूल के बागी

Ads

दो गुट, दो राहें: अभूतपूर्व राजनीतिक विभाजन से जूझ रहे तृणमूल के बागी

  •  
  • Publish Date - June 10, 2026 / 01:25 PM IST,
    Updated On - June 10, 2026 / 01:25 PM IST

(सौगत मुखोपाध्याय)

कोलकाता, 10 जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस में उभरता संकट पश्चिम बंगाल की हालिया राजनीति के सबसे विचित्र विरोधाभासों में से एक बन गया है। पार्टी के विधायक दल और संसदीय दल एक साथ बिखरते नजर आ रहे हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दोनों अलग-अलग वैचारिक रास्तों पर चलते हुए भी खुद को पार्टी की ‘वास्तविक’ राजनीतिक पहचान का प्रतिनिधि बता रहे हैं।

तृणमूल कांग्रेस विधायक दल से अलग होकर विधानसभा में मान्यता प्राप्त करने वाले अधिकतर विधायकों ने ‘‘रचनात्मक विपक्ष’’ की भूमिका निभाने का वादा किया और साथ ही बंगाल में भाजपा की राजनीति का विरोध करने की बात कही। वहीं, पांच दिन बाद पार्टी के बागी लोकसभा सांसदों ने अलग राह अपनाते हुए भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के प्रति निष्ठा जताने की घोषणा कर दी।

दोनों गुटों ने अपने कदमों को ‘‘बंगाल के व्यापक विकास’’ के नाम पर सही ठहराने की कोशिश की। उनका तर्क था कि ममता बनर्जी सरकार के दौरान राज्य का विकास बाधित हुआ है।

तीन जून को तृणमूल से निष्कासित विधायक रिताब्रता बनर्जी को विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी। उन्हें तृणमूल के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त था, जो अलग विधायी पहचान के लिए आवश्यक दो-तिहाई संख्या से अधिक है। इससे विधानसभा के भीतर एक अलग गुट औपचारिक रूप से अस्तित्व में आ गया।

रिताब्रता बनर्जी ने तब कहा था, ‘‘हम सदन में रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। यह केवल विरोध के लिए विरोध नहीं होगा, जैसा पहले होता था। यह बंगाल के विकास के लिए विरोध होगा। राजनीतिक रूप से हम भाजपा को एक इंच भी जगह नहीं देंगे।’’

लेकिन इसके केवल पांच दिन बाद आठ जून को दिल्ली में एक समान लेकिन वैचारिक रूप से विपरीत घटनाक्रम सामने आया।

तृणमूल के संसदीय दल के एक धड़े, जिसमें कथित तौर पर 28 में से 20 लोकसभा सदस्य शामिल थे और जिसका नेतृत्व काकोली घोष दस्तीदार कर रही थीं, ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र देकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राजग के साथ जाने की इच्छा जताई। इससे देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था में ममता बनर्जी की स्थिति कमजोर हो गई।

इस कदम ने पार्टी के राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व में विभाजन और केंद्र के सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर अप्रत्याशित वैचारिक झुकाव का संकेत दिया।

काकोली घोष दस्तीदार ने कहा, ‘‘हमने जनादेश को स्वीकार किया है और मानते हैं कि हमारा भविष्य का राजनीतिक रास्ता राजग के साथ होना चाहिए।’’

इन दोनों घटनाओं ने एक दुर्लभ संगठनात्मक विरोधाभास को उजागर किया है। एक ही पार्टी का एक गुट राज्य में भाजपा के खिलाफ आक्रामक विपक्ष बनने का दावा कर रहा है, जबकि दूसरा गुट राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के साथ जाने की ओर अग्रसर दिखाई दे रहा है।

इसका परिणाम केवल संगठनात्मक असहमति नहीं है, बल्कि एक गहरी वैचारिक अस्पष्टता भी है, जो तृणमूल की टूटी हुई संरचना के भीतर ‘‘विपक्ष’’ की परिभाषा को ही बदल सकती है।

यह विरोधाभास भारत की संघीय पार्टी व्यवस्था में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के बीच बढ़ती असमानता को भी रेखांकित करता है।

राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मैत्रा का मानना है कि इस विरोधाभास की व्याख्या भारत की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में निहित है।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारी संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में किसी पार्टी की सबसे बड़ी सफलता यह होती है कि वह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को प्रभावित करने की क्षमता रखे।’’

भारत में दक्षिणपंथी राजनीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि तृणमूल का यह प्रकरण दिखाता है कि एक ही संगठनात्मक पहचान भाजपा के विरोध और उसके साथ सामंजस्य, दोनों को अलग-अलग परिस्थितियों में समाहित कर सकती है।

मैत्रा ने कहा, ‘‘अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को करीब से देखें, तो वह कई मोर्चों के जरिए राजनीति करता है। उसकी राजनीति केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में गहराई तक फैली एक वैचारिक परियोजना है, जिसमें भाजपा उसका प्रमुख राजनीतिक माध्यम है।’’

उन्होंने कहा कि आरएसएस केवल भाजपा में ही निवेश नहीं करता।

उन्होंने कहा, ‘‘अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आरएसएस का प्रभाव विभिन्न राजनीतिक दलों में दिखाई देता है। आरएसएस, हिंदू महासभा और कांग्रेस के कुछ वर्गों के बीच संबंधों पर लंबे समय से चर्चा होती रही है, जबकि कुछ आलोचक आम आदमी पार्टी (आप) और तृणमूल जैसी पार्टियों को भी आरएसएस द्वारा निर्मित व्यापक राजनीतिक वातावरण की उपज मानते हैं।’’

मैत्रा ने कहा कि हालांकि आरएसएस और वामपंथ वैचारिक रूप से एक-दूसरे के विपरीत ध्रुवों पर हैं, लेकिन उनके बीच के राजनीतिक क्षेत्र में कई ऐसे खिलाड़ी मौजूद हैं जिनकी स्थिति परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।

मैत्रा के अनुसार, यही लचीलापन एक ही पार्टी को अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग राजनीतिक रूप अपनाने की अनुमति देता है।

उन्होंने कहा, ‘‘उदाहरण के लिए, बंगाल में कोई पार्टी खुद को भाजपा की विरोधी के रूप में पेश कर सकती है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर वही पार्टी महत्वपूर्ण मुद्दों पर राजग का समर्थन कर सकती है। तृणमूल जैसी पार्टी, जिसके पास कोई स्पष्ट वैचारिक आधार नहीं है और जो सत्ता से बाहर है, उसके लिए ऐसा बहुस्तरीय राजनीतिक अस्तित्व एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गया है।’’

यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह दोहरी राजनीतिक रणनीति केवल परिस्थितियों के कारण अपनाया गया एक अस्थायी कदम है या फिर पार्टी के भीतर किसी बड़े और स्थायी बदलाव की शुरुआत है।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि तृणमूल का आंतरिक विभाजन अब महज गुटबाजी तक सीमित नहीं रहा। यह पार्टी की राजनीतिक पहचान को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में बढ़ चुका है।

जहां तक उन लगभग 20 विधायकों और आठ सांसदों का सवाल है जो फिलहाल ममता बनर्जी के साथ हैं, विश्लेषकों का मानना है कि व्यक्तिगत राजनीतिक हित ही फिलहाल उन्हें अस्थायी तौर पर जोड़े हुए हैं।

एक पर्यवेक्षक ने कहा, ‘‘जो नेता अभी ममता के साथ बने हुए हैं, उनमें से कुछ कांग्रेस पृष्ठभूमि से हैं और कुछ कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े रहे हैं। दोनों ही वैचारिक रूप से भाजपा के विरोधी हैं। वे फिलहाल राजनीतिक कारणों से ममता के साथ रह सकते हैं, लेकिन भविष्य में उनके भी दूसरी ओर जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।’’

भाषा गोला वैभव

वैभव