भोजशाला विवाद : मप्र उच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी, धार्मिक प्रकृति पर फैसला सुरक्षित

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भोजशाला विवाद : मप्र उच्च न्यायालय में सुनवाई पूरी, धार्मिक प्रकृति पर फैसला सुरक्षित

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  • Publish Date - May 12, 2026 / 08:59 PM IST,
    Updated On - May 12, 2026 / 08:59 PM IST

इंदौर, 12 मई (भाषा) धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति के विवाद के मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में महीने भर से ज्यादा वक्त तक चली नियमित सुनवाई मंगलवार को पूरी हो गई और अदालत ने इस मध्यकालीन स्मारक को लेकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई शुरू की। सभी संबद्ध पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

यह सुनवाई विवादित स्मारक से जुड़े अलग-अलग धार्मिक विश्वासों, ऐतिहासिक दावों, कानूनी प्रावधानों की जटिलताओं के साथ ही हजारों दस्तावेजों की पृष्ठभूमि में हुई।

सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत दलीलें पेश कीं और स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लोगों के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा। यह स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।

धार की भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। वहीं, जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने विवादित परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा किया है और कहा है कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू समुदाय भोजशाला में स्थापित वाग्देवी की प्रतिमा बता रहा है, वह असल में जैन यक्षिणी अम्बिका की मूर्ति है।

एएसआई ने स्मारक के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बाद 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया कि इस परिसर में धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद के मुकाबले पहले से विद्यमान थी और वहां वर्तमान में मौजूद एक विवादित ढांचा मंदिरों के हिस्सों का फिर से इस्तेमाल करते हुए बनाया गया था।

नियमित सुनवाई के अंतिम दिन एएसआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने मुस्लिम पक्ष की इस दलील का खंडन किया कि यह रिपोर्ट ‘पक्षपातपूर्ण’ है और इसे हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं के दावों का समर्थन करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

उन्होंने कहा कि सर्वेक्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया को विशेषज्ञों की मदद से अंजाम दिया गया है।

जैन ने एएसआई की निष्पक्षता पर जोर देते हुए कहा कि सर्वेक्षण दल में तीन मुस्लिम जानकार शामिल थे और सर्वेक्षण के दौरान इस समुदाय के प्रतिनिधि भी मौके पर मौजूद थे।

उन्होंने कहा,‘‘एएसआई की ओर से किसी भी समुदाय के साथ पक्षपात का सवाल ही नहीं उठता।’’

मुस्लिम पक्ष ने अपनी दलीलों में यह भी कहा कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण को लेकर उच्च न्यायालय के आदेश में ‘कार्बन डेटिंग’ (पुरातात्विक वस्तुओं या अवशेषों की आयु निर्धारित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया) का निर्देश दिया गया था, लेकिन एएसआई ने यह प्रक्रिया नहीं अपनाई।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि ‘कार्बन डेटिंग’ से जैविक प्रकृति वाली चीजों की उम्र का पता लगाया जाता है और पत्थरों से बनी संरचनाओं के मामले में यह पद्धति उपयोगी नहीं है।

उन्होंने एएसआई की रिपोर्ट के हवाले से कहा,‘‘मौजूदा ढांचा, खुदाई से सामने आईं संरचनाएं और पुरातात्विक अवशेष ऐतिहासिक काल के हैं। चूंकि इनकी आयु निर्धारित करने के लिए पर्याप्त काल-निर्धारक सामग्री उपलब्ध है, इसलिए शैलीगत विश्लेषण और पुरालिपि विज्ञान के आधार पर इनका काल-निर्धारण किया गया है क्योंकि ये संरचनाएं मध्यकाल से संबंधित हैं।’’

जैन ने विवादित स्मारक में एएसआई के सर्वेक्षण के दौरान गौतम बुद्ध की मूर्ति मिलने को लेकर मुस्लिम पक्ष के दावे को भी खारिज किया।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की दलीलों से पहले, मुस्लिम पक्ष के एक हस्तक्षेपकर्ता के वकील सैयद अशहर अली वारसी ने दावा किया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू समुदाय वाग्देवी की प्रतिमा बता रहा है, वह एक जैन यक्षिणी की मूर्ति है और ‘यह प्रतिमा विवादित स्मारक में नहीं, बल्कि इस जगह से करीब आधा किलोमीटर दूर धार के राजबाड़ा स्थित महल से मिली थी।’

भोजशाला मामले में जनहित याचिका दायर करने वाले संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने उच्च न्यायालय में दावा किया है कि भोजशाला मूलत: परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है जिसे मालवा क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज के आक्रमण के दौरान ‘खिलजी के हुक्म पर’ 1305 में ढहाया गया था। संगठन ने यह दावा भी किया है कि विवादित परिसर में मस्जिद बनाने के लिए मंदिर के अवशेषों का पुनः उपयोग किया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने न्यायिक क्षेत्राधिकार का सवाल खड़ा करते हुए इस दलील पर बार-बार जोर दिया कि हिंदू पक्ष की यह याचिका दरअसल एक दीवानी मुकदमा है और इसे उच्च न्यायालय की रिट कार्यवाही के बजाय किसी दीवानी अदालत में चलाया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। एएसआई ने 22 मार्च 2024 से इस परिसर का सर्वेक्षण शुरू किया था। एएसआई ने 98 दिनों के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। भाषा हर्ष जोहेब

जोहेब