भोपालः मध्यप्रदेश में इन दिनों बजरंग दल पर बैन को लेकर सियासत गरमा हुई है। कांग्रेस नेताओं ने इस पर बयान देकर इसे तूल दे दिया। हालांकि 24 घंटे के अंदर ही कांग्रेस ने इस पर यूटर्न भी ले लिया। ये चुनावी साल का कैसा समीकरण है। सियासी दलों का कोई सिद्धांत भी है या सिर्फ मौकापरस्ती की राजनीति हो रही है।
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मध्यप्रदेश में जिस रफ्तार से घोषणाओं और बयानों की बौछार हो रही है, उतनी ही तेजी से सियासतदां यू टर्न भी ले रहे हैं। एक ओर प्रदेश सरकार ने ‘द केरल स्टोरी’ को टैक्स फ्री करने का आदेश निरस्त कर दिया है तो दूसरी ओर कांग्रेस नेता बजरंग दल बैन पर विवाद के बाद मुकर गए। कांग्रेस नेताओं के बयान पर भाजपा एक बार फिर हमलावर हो गई और मंत्रियों ने कांग्रेस को खुला चैलेंज दे दिया। कांग्रेस बड़ी मुश्किल से बहुसंख्यक आबादी को साधने की कोशिश कर रही है। इस बीच सज्जन सिंह वर्मा और कांतिलाल भूरिया के बयानों से समीकरण बिगड़ता देख कांग्रेस को अपना स्टैंड साफ करना पड़ा।
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बहरहाल, एक ओर भाजपा मोदी मित्र अभियान के जरिए अल्पसंख्यकों को साधना चाहती है तो दूसरी ओर कांग्रेस अपनी हिंदूवादी छवि को स्ट्रांग करने में जुटी है। ऐसे में पल-पल बदलते बयानों को क्या अवसरवादी राजनीति कहना गलत होगा? क्या सियासी दल अपने सिद्धांतों और स्टैंड को लेकर स्पष्ट नहीं हैं और क्या ऐसे यूटर्न से विश्वसनीयता का संकट और नहीं गहराएगा?