Gwalior Chambal Gun License Dispute : बंदूक एक, दावेदार अनेक! ग्वालियर-चंबल में विरासत के हथियारों पर भाइयों में छिड़ा महा-संग्राम, रिश्तों में पड़ी दरार

ग्वालियर-चंबल अंचल में लाइसेंसी बंदूकें अब सुरक्षा से ज्यादा पारिवारिक विवादों की वजह बनती जा रही हैं। पिता की मौत के बाद वारिसों के बीच हथियार के ट्रांसफर को लेकर घमासान मच रहा है। कई मामलों में एक ही बंदूक पर एक से ज्यादा दावेदार सामने आ रहे हैं, जिससे परिवारों में तनाव और टकराव की स्थिति बन रही है। प्रशासन का कहना है कि आर्म्स एक्ट के तहत लाइसेंस व्यक्तिगत होता है और ट्रांसफर को लेकर कानूनी जटिलताएं हैं।

Gwalior Chambal Gun License Dispute : बंदूक एक, दावेदार अनेक! ग्वालियर-चंबल में विरासत के हथियारों पर भाइयों में छिड़ा महा-संग्राम, रिश्तों में पड़ी दरार

Gwalior Chambal Gun License Dispute / Image Source : AI generated


Reported By: Nasir Gouri,
Modified Date: June 3, 2026 / 02:30 pm IST
Published Date: June 3, 2026 2:26 pm IST
HIGHLIGHTS
  • पिता की मौत के बाद बंदूक के लाइसेंस को लेकर भाइयों में बढ़ रहे विवाद
  • एक हथियार पर एक से ज्यादा वारिसों के दावे से परिवारों में टकराव
  • आर्म्स एक्ट के तहत लाइसेंस ट्रांसफर में कानूनी अड़चन, प्रशासन असमंजस में

ग्वालियर : Gwalior Chambal Gun License Dispute मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल की पहचान रही बंदूक अब रिश्तों पर निशाना साध रही है। पिता की मौत के बाद भाइयों में बंदूक के लाइसेंस को लेकर घमासान मचा है। कलेक्टर ऑफिस की आर्म शाखा में हर महीने ऐसे आवेदन आ रहे हैं, जहां वारिस खुद का नाम ट्रांसफर कराना चाहते हैं। लेकिन प्रशासन ने कानूनी दावपेंच का हवाला देकर ट्रांसफर पर हाथ खड़े कर दिए हैं। परिणाम बंदूक किसी को मिली, न सुरक्षा।

बंदूक की लाइसेंस को लेकर विवाद

ग्वालियर-चंबल अंचल मतलब बंदूक की परंपरा। लेकिन अब यही परंपरा परिवार तोड़ रही है। पिता की मौत के बाद बेटे-बेटियों में बंदूक के लाइसेंस को लेकर आपसी कलह शुरू हो जाती है। कोई कब्जा मांग रहा है, तो कोई पुलिस से बंदूक जमा कराने की मांग कर रहा है। कलेक्टर कार्यालय की आर्म शाखा में रोज ऐसे आवेदन पहुंच रहे हैं। ऐसे ही अमजद खान, पिता को सुरक्षा के लिहाज से बंदूक दी गयी थी, पिता की मौत के बाद बंदूक आज तक ट्रांसफर नही हुई है। अमजद का तर्क है असुरक्षा के डर से ही पिता को लाइसेंस मिला था, अब हमें भी सुरक्षा और रोजगार चाहिए।

Chambal Gun Tradition Controversy  बंदूक एक, दावेदार कई

ग्वालियर में फिलहाल नए हथियार लाइसेंस नहीं बन रहे हैं। लेकिन पूर्व से करीब 34 हजार आर्म लाइसेंस जारी हैं। लाइसेंसधारी की मौत के बाद हर महीने ग्वालियर-चंबल के थानों में 2 से 3 आवेदन आते हैं। वारिस हथियार अपने नाम ट्रांसफर कराना चाहते हैं। तर्क वही पारिवारिक सुरक्षा और कई मामलों में निजी सुरक्षा गार्ड का रोजगार। लेकिन जैसे ही एक से ज्यादा वारिस होते हैं, विवाद शुरू। बंदूक एक, दावेदार कई। कलेक्टर रुचिका चौहान कहती है, इसे फौती लाइसेंस कहते है ये जांच के बाद दिए जाते है।

तीनों भाइयों के बीच टकराव

कई मामलों में ऐसे भी विवाद समाने आएं है, जहां-जहां एक पिता की एक से ज्यादा संतानों से बंदूक पर दावा कर दिया है। ग्वालियर के गौसपुरा नंबर 1 क्षेत्र में रहने वाले बेताल सिंह की 15 नवंबर 2023 में मौत हो गई, उनके पास दो लाइसेंसी हथियार थे। एक 12 बोर दोनाली और दूसरी दो इंची टोपीदार गन, लेकिन बेताल सिंह की मौत के बाद बेटे अनूप की बजाय उसके बेटे टिंकू और विकास ने ये हथियार बिना लाइसेंस ट्रांसफर कराए अपने पास रख लिए, इस वजह से तीनों भाइयो के बीच कई बार टकराव हुआ।

दतिया से भी सामने आया मामला

ग्वालियर के हजीरा क्षेत्र में सामने आया। बंटी राजपूत दो भाई हैं, बुजुर्ग पिता ने लोकसभा चुनाव के दौरान हजीरा थाने में अपनी बंदूक जमा की थी, लेकिन चुनाव के बाद बंदूक वापस लेते उससे पहले ही मौत ही गई। ऐसे में अब बंटी राजपूत और उसका भाई बंदूक पर अपना अपना हक बताते हुए पुलिस से रायफल लेने के लिए आवेदन दे रहे हैं। इसी के चलते दोनों के बीच मनमुटाव हो गया है। दतिया के सुग्रीव सिंह 6 भाई हैं, लेकिन साल भर पहले उसकी मौत हो गई। सुग्रीव के नाम पर लाइसेंसी बंदूक थी, जिसकी वजह से उसके मरने के बाद उसके पांचों भाई बंदूक अपने पास रखना चाहते थे, लेकिन मझले भाई ने उसे अपने कब्जे में ले लिया। इसके बाद से ही ऐसे में पांचों भाइयों में बंदूक के लिए रार हो गई है। हर कोई अपना हक जमाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन कब्जाधारी भाई बंदूक देने को तैयार नहीं है।

रिश्ते बचें या बंदूक?

बहरहाल वारिसों की मांग जायज लगती है, पर कानून अड़चन बन रहा है। आर्म्स एक्ट और गृह मंत्रालय की गाइडलाइन के मुताबिक लाइसेंस व्यक्तिगत होता है। मौत के बाद ऑटोमैटिक ट्रांसफर का प्रावधान नहीं है। अगर कई वारिस हैं तो किसे दें? इसका फैसला करना प्रशासन के लिए कानूनी दावपेंच बन गया है। इसीलिए ग्वालियर प्रशासन ने ज्यादातर ट्रांसफर आवेदन ठंडे बस्ते में डाल दिए हैं। बहरहाल ग्वालियर-चंबल में बंदूक अब सुरक्षा का साधन कम, विवाद की वजह ज्यादा बन गई है। कानून की बारीकियों में फंसकर वारिस न बंदूक ले पा रहे हैं, न सुकून। 34 हजार लाइसेंस हैं, पर ट्रांसफर की पॉलिसी साफ नहीं। सवाल वही…रिश्ते बचें या बंदूक?

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लेखक के बारे में

I’m Sneha Singh, a journalist and news producer at IBC24. A Gold Medalist in Journalism and Mass Communication, I specialize in news production, content writing, and digital storytelling. With a keen interest in political and crime reporting, I believe in delivering accurate, ethical, and impactful journalism that informs and connects with people.