इंदौर, 16 फरवरी (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने शीर्ष अदालत के एक आदेश का हवाला देते हुए सोमवार को कहा कि धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर जारी विवाद से जुड़ी लंबित याचिकाओं को सुनवाई के आवश्यक आदेश के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत किया जाए।
भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष 11वीं सदी के इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
उच्चतम न्यायालय ने 22 जनवरी को उच्च न्यायालय को निर्देश दिया था कि वह विवादित परिसर के बारे में एएसआई द्वारा सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट सार्वजनिक करे। इस आदेश के बाद उच्च न्यायालय में सोमवार को पहली बार यह मामला सूचीबद्ध हुआ था।
हालांकि, प्रदेश भर में वकीलों की एक दिवसीय हड़ताल के चलते किसी भी पक्ष का अधिवक्ता उच्च न्यायालय में पैरवी के लिए नहीं पहुंचा। हिंदू और मुस्लिम समुदायों के दो पक्षकार इस मामले में अदालत में खुद हाजिर हुए।
बाद में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर से जुड़े विवाद के मामले में शीर्ष अदालत के 22 जनवरी के निर्देशों के हवाले से एक आदेश पारित किया और अगली सुनवाई के लिए 18 फरवरी की तारीख तय की।
अदालत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के मुताबिक इस विवाद को लेकर इंदौर पीठ में चल रहे मुकदमों को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सामने पेश किया जाए ताकि जबलपुर स्थित प्रधान पीठ में लंबित एक रिट अपील के साथ इनकी सुनवाई के लिए आवश्यक आदेश मिल सके।
उच्चतम न्यायालय ने पिछले महीने कहा था कि यह न्यायोचित होगा कि धार के विवादित परिसर को लेकर उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में लंबित एक रिट याचिका पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या इस पीठ के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ सुनवाई करे।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि उच्च न्यायालय की जबलपुर स्थित प्रधान पीठ में लंबित एक रिट अपील और संबंधित मुकदमों की सुनवाई मुख्य रिट याचिका के साथ खंड पीठ द्वारा की जाए।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में सोमवार को हुई सुनवाई में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के पक्षकार आशीष गोयल और मुस्लिम पक्ष की ओर से मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी से जुड़े अब्दुल समद खुद उपस्थित रहे।
समद ने संवाददाताओं से कहा कि अदालत द्वारा विवादित परिसर के बारे में किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले उच्च न्यायालय की जबलपुर स्थित मुख्य पीठ में उनके पक्ष की ओर से वर्ष 2019 में दायर याचिका का निपटारा किया जाना चाहिए।
मुस्लिम पक्ष के नेता के मुताबिक इस याचिका में विवादित परिसर को लेकर एएसआई के सात अप्रैल 2003 के एक आदेश को अनुचित बताया गया है और कहा गया है कि इस आदेश का कथित रूप से उचित पालन नहीं किया जा रहा है।
धार के परिसर को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई के जारी इस आदेश के अनुसार अब तक चली आ रही व्यवस्था के मुताबिक हिंदुओं को वहां प्रत्येक मंगलवार पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार इस जगह नमाज अदा करने की इजाजत दी गई है।
उच्चतम न्यायालय ने 22 जनवरी को उच्च न्यायालय को निर्देश दिया था कि वह एएसआई द्वारा सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई सर्वेक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करे और इसे संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराए जो इस पर उनकी आपत्ति दर्ज करा सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आपत्तियां दर्ज किए जाने के बाद मामले की अंतिम सुनवाई की जाएगी।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि जब तक मामले में अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, सभी पक्षकार विवादित परिसर में यथास्थिति बनाए रखेंगे और वे एएसआई के अप्रैल 2023 के आदेश का पालन जारी रखेंगे।
भाषा
हर्ष
रवि कांत